टीईटी अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश, शिक्षामित्रों और शिक्षकों पर बढ़ा दबाव

टीईटी अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश, शिक्षामित्रों और शिक्षकों पर बढ़ा दबाव

नई दिल्ली/प्रयागराज। देश में प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी शिक्षकों को सेवा में बने रहने के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा। हालांकि व्यावहारिक कठिनाइयों को देखते हुए अदालत ने राहत देते हुए समयसीमा दो वर्ष से बढ़ाकर तीन वर्ष कर दी है।

अब शिक्षकों को 31 अगस्त 2028 तक टीईटी पास करना अनिवार्य होगा। कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि इस समयसीमा को आगे किसी भी स्थिति में नहीं बढ़ाया जाएगा।

पुनर्विचार याचिकाएं खारिज

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने इस मामले में दायर 65 पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया। याचिकाओं में 2025 के उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई थी, जिसमें आरटीई अधिनियम, 2009 लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी पास करना अनिवार्य किया गया था।

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कोर्ट का स्पष्ट संदेश

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा—

  • टीईटी केवल औपचारिक परीक्षा नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने का माध्यम है
  • बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है
  • शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता तय करना आवश्यक है

कोर्ट ने यह भी कहा कि बिना टीईटी योग्य शिक्षकों को लंबे समय तक सेवा में बनाए रखना आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ समझौता होगा।

“पूर्वव्यापी कानून” का तर्क खारिज

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि पुराने शिक्षकों पर टीईटी लागू करना कानून का पूर्वव्यापी उपयोग है। लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि आरटीई अधिनियम में पहले से ही यह प्रावधान है कि सेवारत शिक्षक भी निर्धारित समय में आवश्यक योग्यता प्राप्त करेंगे।

नौकरी जाने का डर, पर कोर्ट सख्त

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि—

केवल इस आधार पर निर्णय नहीं बदला जा सकता कि बड़ी संख्या में शिक्षक अपनी नौकरी खो सकते हैं।

कोर्ट के अनुसार, बच्चों का भविष्य सर्वोपरि है, और शिक्षकों की सेवा इस कीमत पर नहीं जारी रखी जा सकती।

राज्यों को भी निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया है कि—

  • टीईटी परीक्षा नियमित रूप से आयोजित की जाए
  • अधिमानतः साल में दो बार परीक्षा कराई जाए
  • शिक्षकों को पर्याप्त अवसर दिए जाएं

शिक्षामित्रों पर क्या पड़ेगा असर?

यह फैसला विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के शिक्षामित्रों के लिए महत्वपूर्ण है, जो पहले से ही नियमितीकरण की मांग को लेकर न्यायालय में लड़ाई लड़ रहे हैं।
अब उनके सामने दोहरी चुनौती है—

  1. नियमितीकरण की कानूनी लड़ाई
  2. टीईटी उत्तीर्ण करने की अनिवार्यता

होगी।

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