शिक्षामित्रों के नियमितीकरण पर फिर उठी बहस: हाई कोर्ट में चुनौती, सरकार से मांगा जवाब
प्रयागराज। उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत शिक्षामित्रों के नियमितीकरण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक के रूप में नियमित किए जाने से इंकार करने के राज्य सरकार के फैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। इस मामले में न्यायालय ने केंद्र एवं राज्य सरकार से चार सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है।
क्या है पूरा मामला?

वाराणसी निवासी जितेंद्र कुमार भारती द्वारा दाखिल याचिका में 11 मई 2026 को जारी उस सरकारी आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक के पद पर नियमित करने से इंकार किया गया था। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मंजुरानी चौहान की एकल पीठ द्वारा की जा रही है। कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 17 जुलाई निर्धारित की है।
शिक्षामित्रों की प्रमुख मांगें
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सत्येन्द्र चंद्र त्रिपाठी ने कोर्ट में दलील दी कि—
- प्रदेश में लगभग 1.70 लाख शिक्षामित्र वर्षों से कार्यरत हैं
- उन्हें मात्र ₹18,000 मासिक मानदेय दिया जा रहा है
- जबकि वे सहायक अध्यापक के समान कार्य कर रहे हैं
- उन्हें पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ नहीं मिलते
25 वर्षों की सेवा, फिर भी असुरक्षा
याचिका में यह भी कहा गया है कि कई शिक्षामित्र पिछले 25 वर्षों से लगातार सेवा दे रहे हैं, लेकिन उन्हें स्थायी कर्मचारी का दर्जा नहीं दिया गया। इतना ही नहीं, सेवा के दौरान मृत्यु होने पर उनके परिवार को किसी प्रकार की आर्थिक सुरक्षा या पेंशन नहीं मिलती।
संवैधानिक दायित्व का हवाला
याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 39, 42, 43 और 47 का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य सरकार का दायित्व है कि वह संविदा एवं दैनिक भोगी कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करे। लेकिन शिक्षामित्रों के मामले में यह दायित्व पूरा नहीं किया जा रहा है।
क्या हो सकता है असर?
यह मामला केवल शिक्षामित्रों के भविष्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य में संविदा कर्मचारियों की स्थिति और अधिकारों को लेकर भी एक बड़ा संकेत दे सकता है। यदि न्यायालय शिक्षामित्रों के पक्ष में निर्णय देता है, तो यह लाखों कर्मचारियों के लिए एक मिसाल बन सकता है।
निष्कर्ष
शिक्षामित्रों का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय रहा है। अब यह मामला न्यायपालिका के सामने है, जहां से आने वाला निर्णय न केवल शिक्षामित्रों के जीवन को प्रभावित करेगा, बल्कि सरकार की नीतियों और संविदा रोजगार व्यवस्था पर भी व्यापक प्रभाव डालेगा।
अब सबकी नजरें 17 जुलाई की अगली सुनवाई पर टिकी हैं।
