जस्टिस यशवंत वर्मा का नाम अब दिल्ली हाईकोर्ट के सरकारी बंगले में मिली भारी नकदी के कारण सुर्खियों में है, लेकिन उनका विवादों से पुराना नाता है। 2018 में गाजियाबाद की सिंभावली चीनी मिल में 97.85 करोड़ रुपये की बैंक धोखाधड़ी मामले में भी उनका नाम सामने आया था।
सिंभावली चीनी मिल घोटाला: मुख्य बिंदु
✅ बैंक धोखाधड़ी: ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स (ओबीसी) ने 5,762 किसानों की मदद के लिए 148.59 करोड़ रुपये का लोन दिया था, लेकिन कंपनी ने फर्जी KYC दस्तावेजों का उपयोग कर पैसे का गबन कर लिया।
✅ यशवंत वर्मा की भूमिका: 2018 में जब सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की, तब वर्मा गैर-कार्यकारी निदेशक थे और उनका नाम 10वें नंबर पर था।
✅ अन्य आरोपी: पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के दामाद गुरपाल सिंह भी इस घोटाले में शामिल थे।
✅ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने CBI जांच का आदेश दिया: दिसंबर 2023 में, हाईकोर्ट ने कहा कि यह घोटाला न्यायपालिका की अंतरात्मा को झकझोर देने वाला मामला है और इसमें 900 करोड़ रुपये की हेराफेरी हो सकती है।
✅ सुप्रीम कोर्ट ने जांच रद्द की: फरवरी 2024 में शुरू हुई नई CBI जांच को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया, जिससे आगे की जांच बंद करनी पड़ी।
नकदी बरामदगी और पुराने घोटाले का संबंध?
- दिल्ली हाईकोर्ट के सरकारी बंगले से मिली नकदी और सिंभावली चीनी मिल घोटाले के बीच कोई सीधा संबंध अभी तक सामने नहीं आया है, लेकिन यह दोनों मामले यशवंत वर्मा की वित्तीय गतिविधियों पर सवाल उठाते हैं।
- इस मामले में सीबीआई और ईडी की जांच जरूरी हो सकती है ताकि यह पता लगाया जा सके कि बरामद नकदी का स्रोत क्या है।
क्या यह मामला न्यायपालिका की साख को प्रभावित करेगा?
✔ सवाल न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही पर उठ रहे हैं।
✔ क्या उच्च न्यायपालिका में बैठे जजों की जांच होनी चाहिए?
✔ क्या CBI को इस केस में स्वतंत्र रूप से जांच करने की अनुमति मिलनी चाहिए?
यह मामला भारतीय न्यायपालिका के लिए एक लिटमस टेस्ट हो सकता है कि क्या भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े जजों पर सख्त कार्रवाई हो सकती है या नहीं।
