बॉम्बे हाईकोर्ट: महिला की सहमति के बिना तस्वीर का उपयोग व्यावसायिक शोषण ⚖️📸

बॉम्बे हाईकोर्ट: महिला की सहमति के बिना तस्वीर का उपयोग व्यावसायिक शोषण ⚖️📸

बॉम्बे हाईकोर्ट ने सरकारी विज्ञापनों में महिला की सहमति के बिना उसकी तस्वीर के उपयोग को व्यावसायिक शोषण करार दिया है। अदालत ने इसे मौजूदा डिजिटल युग और सोशल मीडिया के प्रभाव को देखते हुए गंभीर मामला बताया है।


📌 मामला क्या है?

यह मामला नम्रता अंकुश कवले की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि:

🔹 उनके एक परिचित फोटोग्राफर तुकाराम कर्वे ने बिना अनुमति उनकी तस्वीर खींची और उसे शटरस्टॉक (Shutterstock) वेबसाइट पर अपलोड कर दिया।
🔹 इसके बाद, भारत सरकार के केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय, चार राज्य सरकारों (महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, ओडिशा) और कुछ निजी कंपनियों ने इस तस्वीर का बिना सहमति के विज्ञापनों और सार्वजनिक प्रदर्शनों में इस्तेमाल किया
🔹 यह न केवल निजता के अधिकार का उल्लंघन है बल्कि महिला के व्यावसायिक शोषण का मामला भी बनता है

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⚖️ कोर्ट की सख्त टिप्पणी और नोटिस

बॉम्बे हाईकोर्ट की जस्टिस जीएस कुलकर्णी और जस्टिस अद्वैत सेठना की खंडपीठ ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार, चार राज्य सरकारों, कांग्रेस पार्टी और अमेरिका स्थित कंपनी शटरस्टॉक को नोटिस जारी किया

📌 नोटिस जारी किए गए:
अमेरिका स्थित कंपनी शटरस्टॉक
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय
महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और ओडिशा सरकारें
निजी कंपनी टोटल डेंटल केयर

⚠️ अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 24 मार्च 2025 को तय की है


📢 डिजिटल युग में निजता का सवाल!

बॉम्बे हाईकोर्ट का यह रुख डिजिटल युग में निजता और सहमति के महत्व को रेखांकित करता है। यह फैसला यह भी दर्शाता है कि बिना सहमति तस्वीरों का व्यावसायिक उपयोग गैरकानूनी और नैतिक रूप से गलत है

👩‍⚖️ क्या कहता है कानून?

🔹 निजता का अधिकार (Right to Privacy): किसी की तस्वीर का बिना अनुमति उपयोग करना निजता का उल्लंघन है।
🔹 आईटी एक्ट और कॉपीराइट कानून: किसी की तस्वीर का व्यावसायिक उपयोग करने के लिए उसकी सहमति आवश्यक होती है।
🔹 मानहानि और मानसिक उत्पीड़न: यदि किसी व्यक्ति की तस्वीर गलत तरीके से इस्तेमाल की जाती है, तो वह मानहानि और मानसिक उत्पीड़न का दावा कर सकता है


🚀 निष्कर्ष

यह मामला महिला अधिकारों, निजता और डिजिटल सुरक्षा से जुड़ा है। हाईकोर्ट का यह फैसला डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और सरकारी एजेंसियों को सतर्क करने वाला कदम साबित हो सकता है। 24 मार्च की सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

📢 क्या आपको लगता है कि डिजिटल युग में सहमति के बिना तस्वीरों का उपयोग गंभीर मुद्दा बन सकता है? अपने विचार साझा करें! 💬

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