मस्क की स्टारलिंक को 20 नहीं, सिर्फ 5 साल के लिए मिलेगा सैटेलाइट स्पेक्ट्रम
नई दिल्ली: सरकार ने सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन पर बड़ा फैसला लिया है। एलन मस्क की स्टारलिंक और अन्य कंपनियों को अब 20 साल के बजाय सिर्फ 5 साल के लिए स्पेक्ट्रम दिया जाएगा। इस पर दूरसंचार नियामक ट्राई जल्द ही सरकार को अपनी सिफारिशें भेजेगा।
क्या चाहती थीं कंपनियां?
- स्टारलिंक: सबसे लंबी अवधि (20 साल) के लिए सैटेलाइट स्पेक्ट्रम की मांग कर रही थी।
- ग्लोबल कंपनियां: सरकार से स्पष्टता चाहती हैं कि स्पेक्ट्रम की कीमतें कैसे तय होंगी।
- भारतीय टेलीकॉम कंपनियां: चाहती हैं कि लाइसेंसिंग में पारदर्शिता बनी रहे और उनकी बाजार हिस्सेदारी प्रभावित न हो।
सरकार का निर्णय क्यों?
सरकार ने इस निर्णय के पीछे तीन मुख्य कारण बताए:
- कम अवधि का ट्रायल: पहले पांच साल में कंपनियों के प्रदर्शन को देखा जाएगा।
- कीमतों में पारदर्शिता: सरकार मूल्य निर्धारण को अधिक लचीला रखना चाहती है।
- नए खिलाड़ियों के लिए अवसर: लंबी अवधि के स्पेक्ट्रम आवंटन से नए निवेशकों के लिए बाधाएं बढ़ जातीं।
स्पेक्ट्रम की कीमतों में होगी गिरावट?
सूत्रों के अनुसार, सरकार स्पेक्ट्रम की लागत को कम करने की योजना बना रही है। अभी 20 साल की नीलामी से तुलना करें तो 2028 तक कीमतें 10 गुना तक गिर सकती हैं।
रिलायंस जियो और एयरटेल को क्यों है चिंता?
ग्लोबल कंपनियों के आने से भारतीय टेलीकॉम बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। स्टारलिंक और अन्य विदेशी कंपनियों के आने से अंबानी और भारती समूह के टेलीकॉम सेक्टर पर दबाव बढ़ सकता है।
नए ग्राहक बन सकते हैं स्टारलिंक के लिए फायदेमंद
स्टारलिंक का फोकस उन ग्रामीण इलाकों पर है जहां अभी तक इंटरनेट कनेक्टिविटी सीमित है। सरकार की नीतियों के अनुसार, भारत में 20 करोड़ से अधिक ग्रामीण उपभोक्ता ऐसे हैं जो सैटेलाइट इंटरनेट का उपयोग कर सकते हैं।
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