राष्ट्रीय शिक्षा नीति और त्रि-भाषा फॉर्मूला पर बढ़ता विवाद
नई दिल्ली/चेन्नई: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) और त्रि-भाषा नीति को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। डीएमके के कड़े विरोध के बाद केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे ‘पाखंड’ करार दिया, जिससे यह मुद्दा और गरमा गया है।
डीएमके और विपक्ष का विरोध
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने एनईपी को “भगवा नीति” बताते हुए आरोप लगाया कि इसका मकसद हिंदी को बढ़ावा देना है, न कि देश का विकास।
✔ डीएमके सांसद कनोमोझी ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि तमिलनाडु को दिए जाने वाले फंड को रोका जा रहा है और राज्य पर एनईपी लागू करने का दबाव डाला जा रहा है।
✔ कांग्रेस सांसद के. सुरेश ने भी एनईपी का विरोध किया और कहा कि सरकार शिक्षा प्रणाली का भगवाकरण करना चाहती है।
✔ तमिलनाडु सरकार के सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री पलानीवेल थियागा ने कहा कि त्रि-भाषा नीति पूरी तरह विफल मॉडल है और यह राज्य की द्वि-भाषा नीति का स्थान नहीं ले सकती।
सरकार का पक्ष
✔ निर्मला सीतारमण ने डीएमके पर निशाना साधते हुए कहा कि “तमिल को बर्बर भाषा कहने वाले व्यक्ति की तस्वीर डीएमके नेता अपने कमरे में रखते हैं”।
✔ भाजपा सांसद सौमित्र खान ने कहा कि सरकार में संसद में 16 भाषाओं का उपयोग किया जा सकता है और कई सरकारी परीक्षाएं क्षेत्रीय भाषाओं में हो रही हैं।
✔ केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि तमिलनाडु सरकार इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दे रही है।
तीन-भाषा नीति क्या है?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP)-2020 के तहत त्रि-भाषा नीति का सुझाव दिया गया है, जिसमें छात्रों को तीन भाषाएं सीखनी होंगी, जिनमें से दो भारतीय भाषाएं होनी चाहिए।
✔ यह नीति सरकारी और निजी दोनों स्कूलों पर लागू होगी।
✔ पहली बार 1964-66 में शिक्षा आयोग ने इसका प्रस्ताव दिया था।
✔ 1968 में इंदिरा गांधी सरकार, 1986 में राजीव गांधी सरकार और 1992 में नरसिंह राव सरकार ने इसे अपनाया था।
निष्कर्ष
एनईपी और त्रि-भाषा नीति को लेकर तमिलनाडु सरकार और केंद्र सरकार के बीच टकराव जारी है। एक तरफ केंद्र इसे राष्ट्रीय एकता और भाषाई समावेशिता को बढ़ाने का माध्यम मान रही है, तो वहीं डीएमके और विपक्ष इसे क्षेत्रीय भाषाओं पर हिंदी थोपने की कोशिश बता रहे हैं। अब देखना होगा कि आगामी दिनों में यह विवाद क्या नया मोड़ लेता है।
