स्वास्थ्य:- कच्चे घरों में रहने वाले लोगों में टीबी का खतरा अधिक,टीबी: अब भी एक घातक बीमारी








कच्चे घरों में रहने वालों में टीबी का खतरा अधिक

कच्चे घरों में रहने वाले लोगों में टीबी का खतरा अधिक

**कच्चे घरों में टीबी का बढ़ता खतरा**

एक अध्ययन के अनुसार, पक्के घरों में रहने वालों की तुलना में कच्चे और आधे पक्के घरों
में रहने वाले लोगों में टीबी (तपेदिक) का खतरा अधिक है। इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंसेज,
मुंबई, और साउथ एशिया इंफैंट फीडिंग नेटवर्क के शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया है।
यह अध्ययन बीएमसी इंफेक्शियस डिजीज जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

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**अध्ययन की मुख्य बातें**

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के चौथे और पांचवें दौर (2015-16 और 2019-21) के आंकड़ों का
उपयोग कर यह अध्ययन किया गया। इसमें पाया गया कि:

  • अलग रसोई न होने और अशुद्ध ईंधन का उपयोग करने से टीबी का खतरा बढ़ता है।
  • भीड़भाड़ वाले घरों में रहने से टीबी का प्रसार अधिक देखा गया।
  • गरीबों में टीबी का प्रसार कुल मामलों का 18.5% है।
  • 6-17 वर्ष की आयु के बच्चों में टीबी के प्रसार में गिरावट हुई है (1.7% से घटकर 1.2% हुआ)।

**टीबी: अब भी एक घातक बीमारी**

तपेदिक (टीबी) दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में से एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार:

  • 2022 में टीबी के कारण 13 लाख मौतें हुईं।
  • 12 लाख से अधिक बच्चे और किशोर टीबी से प्रभावित हुए। इनमें से आधे 5 वर्ष से कम उम्र के थे।
  • दुनिया के 26% टीबी मामले भारत में हैं।
  • भारत में 0 से 14 वर्ष के बीच के 3.33 लाख से अधिक बच्चे टीबी से पीड़ित हैं।

**सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में सुधार की जरूरत**

शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि टीबी के प्रसार को कम करने के लिए सामाजिक और आर्थिक सुधार आवश्यक हैं।
जिन क्षेत्रों में बेहतर आवास, स्वच्छ ईंधन और स्वच्छता सुविधाएं उपलब्ध हैं, वहां टीबी के मामलों में कमी देखी गई है।
हालांकि, अध्ययन में पुरुषों और महिलाओं में टीबी के प्रसार में कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया।

निष्कर्ष: टीबी के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए बेहतर आवास, स्वच्छ ईंधन और सामाजिक-आर्थिक सुधारों की आवश्यकता है।
सरकार और समाज को मिलकर टीबी के खिलाफ लड़ाई में योगदान देना चाहिए।


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