इलाहाबाद हाईकोर्ट: महिलाओं के अधिकार और गोपनीयता को बढ़ावा देने वाले ऐतिहासिक फैसले
तारीख: 3 जनवरी, 2025
मामला 1: पत्नी की गोपनीयता का संरक्षण
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पत्नी पति की जागीर नहीं है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने मिर्जापुर निवासी बृजेश यादव की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उसने आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी।
यह मामला तब शुरू हुआ जब 9 जुलाई, 2023 को बृजेश की पत्नी ने उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। पत्नी ने आरोप लगाया कि बृजेश ने मुकदमेबाजी की रंजिश में उसके अंतरंग वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दिए, जिससे उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।
बृजेश के वकील ने दलील दी कि वह कानूनी रूप से उसकी पत्नी है और अंतरंगता उसका अधिकार है। कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा, “पत्नी का शरीर और गोपनीयता केवल उसकी है। वैवाहिक रिश्ते की पवित्रता और भरोसे का सम्मान करना पति का कर्तव्य है।”
मामला 2: बिना घूंघट बाजार जाने पर तलाक की अपील
एक और दिलचस्प मामले में हाईकोर्ट ने पति के इस दावे को खारिज कर दिया कि पत्नी का बिना घूंघट बाजार जाना मानसिक क्रूरता है। पति ने कहा कि उसकी पत्नी की इस आदत से समाज में उसे ताने सुनने पड़ते हैं और यह तलाक का आधार होना चाहिए।
न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और डोनाडी रमेश की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी महिला का अपनी परंपराओं का पालन न करना क्रूरता नहीं हो सकता। हालांकि, कोर्ट ने पत्नी के वैवाहिक संबंध निभाने से इनकार को तलाक का वैध आधार मानते हुए पति की अपील स्वीकार कर ली।
मामला 3: श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर पूजा-अधिकार
इलाहाबाद हाईकोर्ट में मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवादित स्थल पर पूजा और परिक्रमा को लेकर याचिका दाखिल की गई है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति निर्माण ट्रस्ट ने श्रीकृष्ण कूप पर पारंपरिक पूजा और परिक्रमा की बहाली की मांग की है।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि वर्षों से चली आ रही बसोड़ा पूजा को शाही मस्जिद ईदगाह प्रबंधन द्वारा रोका जा रहा है। कोर्ट इस मामले पर विचार कर रहा है, जो सांस्कृतिक परंपराओं और विवादित स्थानों के प्रबंधन के बीच संतुलन का एक उदाहरण है।
मामला 4: सीटेट परीक्षा में फर्जी अभ्यर्थी
हाईकोर्ट ने हाल ही में केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा (सीटेट) में फर्जी तरीके से परीक्षा देने की आरोपी विंध्यवासिनी सिंह को सशर्त जमानत दी। यह मामला प्रयागराज का है, जहां आरोपी मऊ की एक अभ्यर्थी की जगह परीक्षा दे रही थी।
कोर्ट ने परीक्षा की शुचिता को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया और आरोपी के अधिकारों का भी ध्यान रखा। यह मामला शैक्षणिक अनियमितताओं से निपटने में न्यायपालिका की सतर्कता को दर्शाता है।
निष्कर्ष: प्रगतिशील न्यायिक दृष्टिकोण
इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया फैसले महिलाओं के अधिकार, वैवाहिक समानता और सामाजिक प्रगति की दिशा में एक सकारात्मक कदम हैं। ये फैसले दिखाते हैं कि न्यायपालिका कैसे पुराने पितृसत्तात्मक विचारों को चुनौती देकर एक समान समाज के निर्माण में योगदान दे रही है।
ये निर्णय न केवल महिलाओं की गोपनीयता और स्वायत्तता की रक्षा करते हैं, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता को बढ़ावा देने में भी मददगार साबित होते हैं।
