⚖️ 13 साल से कोमा में पड़े युवक को सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु की मंजूरी, देश में पहली बार लागू हुआ पैसिव यूथेनेशिया

⚖️ 13 साल से कोमा में पड़े युवक को सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु की मंजूरी, देश में पहली बार लागू हुआ पैसिव यूथेनेशिया

नई दिल्ली: एक ऐतिहासिक और भावुक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने 13 साल से कोमा में चल रहे हरीश राणा को इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी है। अदालत ने यह फैसला हरीश के पिता अशोक राणा की अपील पर सुनाया।

कोर्ट के निर्देश के अनुसार अब एम्स नई दिल्ली की चिकित्सकीय निगरानी में हरीश की जीवनरक्षक प्रणाली हटाई जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया मानवीय तरीके और विशेषज्ञों की निगरानी में की जानी चाहिए ताकि मरीज की गरिमा बनी रहे।


🏥 2013 में हादसे के बाद कोमा में चले गए थे हरीश

गाजियाबाद निवासी हरीश राणा चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष के छात्र थे और वेटलिफ्टर बनने का सपना देखते थे।

  • अगस्त 2013 में रक्षाबंधन के दिन
  • पीजी की चौथी मंजिल से गिरने के कारण
  • सिर और कमर में गंभीर चोटें आईं

इस हादसे के बाद वह स्थायी कोमा में चले गए और उनका शरीर पूरी तरह निष्क्रिय हो गया।


⚖️ हाईकोर्ट से निराशा, सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत

हरीश के पिता ने 2024 में इलाज हटाने की अनुमति के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन वहां से अनुमति नहीं मिली।

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इसके बाद परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्ड गठित किए।

दोनों मेडिकल बोर्डों की रिपोर्ट में कहा गया कि:

  • मरीज के ठीक होने की संभावना लगभग शून्य है
  • उपचार जारी रखने से केवल जैविक जीवन लंबा हो रहा है, सुधार की उम्मीद नहीं है।

👨‍⚖️ फैसला सुनाते समय भावुक हुई अदालत

यह फैसला जस्टिस जे.वी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने सुनाया।

फैसला सुनाते समय जस्टिस पारदीवाला भावुक हो गए और कहा:

“हरीश कभी मेधावी छात्र थे और अच्छे भविष्य के सपने देखते थे, लेकिन एक हादसे ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी। उन्हें अनंत पीड़ा में रखना मानवीय नहीं है।”


📜 2018 के ऐतिहासिक फैसले के बाद पहला मामला

यह पहला मामला है जिसमें कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018) के फैसले को लागू करते हुए पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी गई है।

अदालत ने इस मामले में 30 दिन की पुनर्विचार अवधि भी हटाते हुए सीधे जीवनरक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दे दी।


❤️ परिवार की हिम्मत की सराहना

अदालत ने हरीश के माता-पिता की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने 13 वर्षों तक अपने बेटे का साथ नहीं छोड़ा

हरीश के पिता अशोक राणा और मां निर्मला राणा ने कहा:

“कौन से माता-पिता अपने बेटे के लिए इच्छामृत्यु मांगना चाहेंगे, लेकिन हर दिन उसकी पीड़ा देखना हमारे लिए असहनीय हो गया था।”


🫀 बेटे के अंग दान करना चाहता है परिवार

हरीश के माता-पिता ने एक और बड़ा फैसला लिया है। उनका कहना है कि:

  • हरीश के जो भी अंग उपयोगी हों, उन्हें दान किया जाए
  • ताकि किसी जरूरतमंद को नई जिंदगी मिल सके।

उनका कहना है कि अगर बेटे के अंगों से किसी की जान बचती है तो यह उनके जीवन की सबसे बड़ी संतुष्टि होगी।


📢 केंद्र सरकार से कानून बनाने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि भारत में एंड-ऑफ-लाइफ केयर (जीवन के अंतिम चरण की चिकित्सा देखभाल) को लेकर अभी कोई व्यापक कानून नहीं है

अदालत ने भारत सरकार से इस विषय पर स्पष्ट और व्यापक कानून बनाने पर विचार करने को कहा है।


✍️ सरकारी कलम निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत में मरीज की गरिमा, मानवीय अधिकार और जीवन के अंतिम चरण की चिकित्सा देखभाल से जुड़े मुद्दों पर एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल बन सकता है। यह फैसला आने वाले समय में इच्छामृत्यु और एंड-ऑफ-लाइफ केयर से जुड़े कानूनों को आकार देने में अहम भूमिका निभा सकता है।

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