कानपुर में बड़ी कार्रवाई: 70 करोड़ की संपत्ति वाले लेखपाल आलोक दुबे बर्खास्त
⚖️ कानपुर में आय से अधिक संपत्ति के मामले में बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई हुई है। मंडलायुक्त के. विजयेन्द्र पांडियन ने करोड़ों की संपत्ति अर्जित करने के आरोप में लेखपाल आलोक दुबे को सेवा से बर्खास्त कर दिया है।
बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बैठक के ठीक एक दिन बाद यह कड़ा फैसला लिया गया।
💰 70 करोड़ से ज्यादा की 41 संपत्तियों का खुलासा
जांच के दौरान सामने आया कि राजस्व निरीक्षक रहे आलोक दुबे ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए भारी मात्रा में संपत्ति बनाई।
जांच में खुलासा हुआ कि:
- उनके पास 70 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति पाई गई
- कुल 41 संपत्तियों का पता चला
- कई बेनामी संपत्तियों का भी खुलासा हुआ
जांच एजेंसियों को यह भी पता चला कि जमीनों की खरीद-फरोख्त में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं और हेराफेरी की गई।
⬇️ पहले किया गया था डिमोशन
मामला सामने आने के बाद प्रशासन ने पहले आलोक दुबे पर कार्रवाई करते हुए:
- उन्हें राजस्व निरीक्षक पद से डिमोट किया
- बाद में लेखपाल बनाकर बिल्हौर तहसील में तैनात किया गया
हालांकि इसके बाद भी जांच और विभागीय कार्रवाई जारी रही।
📜 अपील भी हुई खारिज
आलोक दुबे ने अपने खिलाफ हुई कार्रवाई के खिलाफ अपील दाखिल की थी, लेकिन मंडलायुक्त ने उसे खारिज कर दिया।
इसके साथ ही अंतिम निर्णय लेते हुए उनकी सेवा समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया गया।
⚠️ जमीन खरीद-फरोख्त में मिली संलिप्तता
मंडलायुक्त के. विजयेन्द्र पांडियन के अनुसार, मामला उस समय सामने आया जब आलोक दुबे राजस्व निरीक्षक पद पर कार्यरत रहते हुए जमीनों के क्रय-विक्रय में संलिप्त पाए गए।
जांच में यह भी पाया गया कि उन्होंने:
- निजी लाभ के लिए जमीनों की खरीद-फरोख्त की
- कई मामलों में हेराफेरी और अनियमितताएं कीं
- आय से अधिक संपत्ति अर्जित की
📌 कानपुर में पहली बार इतनी बड़ी कार्रवाई
अधिकारियों का दावा है कि कानपुर में किसी लेखपाल को आय से अधिक संपत्ति के मामले में बर्खास्त करने का यह पहला मामला है।
इस कार्रवाई को प्रशासन की भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त नीति के रूप में देखा जा रहा है।
✅ निष्कर्ष
कानपुर में लेखपाल आलोक दुबे के खिलाफ हुई यह कार्रवाई भ्रष्टाचार के मामलों में प्रशासन की सख्ती को दर्शाती है। आय से अधिक संपत्ति और पद के दुरुपयोग के आरोप साबित होने के बाद उनकी सेवा समाप्त कर दी गई है, जिससे सरकारी कर्मचारियों को स्पष्ट संदेश गया है कि भ्रष्टाचार किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
