⚖️ नाम की स्पेलिंग बनी 45 साल की सजा! हाईकोर्ट की फटकार के बाद मिली पारिवारिक पेंशन 👩⚖️
कानपुर। महज एक अक्षर की गलती ने एक महिला को 45 वर्षों तक पारिवारिक पेंशन के लिए दफ्तरों के चक्कर कटवाए। आखिरकार इलाहाबाद हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पीड़िता को राहत मिली। कोर्ट ने नगर निगम कानपुर के अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए एक सप्ताह में मामले का निस्तारण करने का आदेश दिया है।
यह आदेश विक्रम डी चौहान ने मंजू राय की याचिका पर सुनाया।
📝 ‘I’ और ‘E’ का अंतर बना बड़ी परेशानी
मामले की जड़ में थी नाम की स्पेलिंग में मामूली अंतर।
याची मंजू राय के पिता नगर निगम में कर्मचारी थे।
- वर्ष 1975 में सेवानिवृत्त हुए
- वर्ष 1980 में उनका निधन हो गया
सेवाकाल और सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें नियमित पेंशन मिलती रही। लेकिन मृत्यु के बाद जब परिवार ने फैमिली पेंशन के लिए आवेदन किया, तो विभागीय रिकॉर्ड में नाम की स्पेलिंग को लेकर आपत्ति लगा दी गई।
🔎 विभागीय सर्विस रिकॉर्ड में नाम “Shikhar Nath Shukla” (शिखर नाथ शुक्ला) दर्ज था,
जबकि आवेदन पत्र व अन्य दस्तावेजों में “Shekhar Nath Shukla” (शेखर नाथ शुक्ला) लिखा था।
अंग्रेजी में लिखे नाम में सिर्फ ‘I’ और ‘E’ का अंतर था, लेकिन इसी आधार पर फाइल वर्षों तक अटकी रही।
⏳ 45 साल तक न्याय का इंतजार
परिवार लगातार विभाग के चक्कर लगाता रहा, लेकिन हर बार तकनीकी आपत्ति लगाकर मामला टाल दिया गया।
आखिरकार पीड़िता ने हाईकोर्ट की शरण ली, जहां न्यायालय ने इसे प्रशासनिक लापरवाही मानते हुए सख्त रुख अपनाया।
कोर्ट ने साफ कहा कि केवल स्पेलिंग की छोटी त्रुटि के आधार पर किसी को दशकों तक पेंशन से वंचित रखना अन्यायपूर्ण है।
✍️ सरकारी कलम की टिप्पणी
यह मामला बताता है कि कैसे सरकारी तंत्र की छोटी सी लापरवाही आम नागरिक के जीवन को दशकों तक प्रभावित कर सकती है।
परिवारिक पेंशन कोई “अनुग्रह” नहीं, बल्कि कर्मचारी की सेवा का अधिकार है।
सरकार को चाहिए कि—
- रिकॉर्ड में नाम की त्रुटियों के लिए सरल सुधार प्रक्रिया हो
- वृद्ध और महिला आवेदकों के मामलों को प्राथमिकता दी जाए
- तकनीकी कारणों से न्याय में देरी न हो
⚠️ एक अक्षर की गलती 45 साल की पीड़ा न बने—प्रशासन को इससे सीख लेनी चाहिए।
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