⚖️ नीट पीजी-2025 कटऑफ विवाद: सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का पक्ष, “डॉक्टरों की योग्यता पर नहीं पड़ेगा असर

⚖️ नीट पीजी-2025 कटऑफ विवाद: सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का पक्ष, “डॉक्टरों की योग्यता पर नहीं पड़ेगा असर”

केंद्र सरकार ने नीट पीजी-2025 की कटऑफ घटाने के फैसले का बचाव करते हुए सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया है कि यह परीक्षा डॉक्टरों की न्यूनतम चिकित्सकीय योग्यता तय करने के लिए नहीं होती, बल्कि सीमित स्नातकोत्तर (PG) सीटों के आवंटन के लिए मेरिट सूची तैयार करने का माध्यम है।

सरकार ने कहा कि कटऑफ में कमी से मरीजों की सुरक्षा या डॉक्टरों की काबिलियत पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।


📜 क्या है मामला?

13 जनवरी की अधिसूचना में National Board of Examinations in Medical Sciences (NBEMS) ने तीसरे राउंड की काउंसलिंग के लिए न्यूनतम पर्सेंटाइल घटा दिया था।

इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जिसके जवाब में केंद्र सरकार ने हलफनामा दाखिल किया।

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🏥 सरकार की दलील: हर अभ्यर्थी पहले से योग्य डॉक्टर

केंद्र ने अदालत में कहा:

✔️ नीट पीजी देने वाला हर उम्मीदवार पहले ही एमबीबीएस डिग्रीधारी और लाइसेंस प्राप्त डॉक्टर होता है।
✔️ पीजी प्रशिक्षण के दौरान वे वरिष्ठ विशेषज्ञों की निगरानी में काम करते हैं।
✔️ तीन वर्ष के प्रशिक्षण के बाद एमडी/एमएस की अंतिम परीक्षा में थ्योरी और प्रैक्टिकल दोनों में न्यूनतम 50% अंक अनिवार्य हैं।

सरकार के अनुसार, इसलिए मरीजों को लेकर चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।


🏛️ किन संस्थाओं ने लिया फैसला?

कटऑफ कम करने का निर्णय Ministry of Health and Family Welfare और National Medical Commission (NMC) ने लिया।

बताया गया कि बड़ी संख्या में पीजी सीटें खाली रहने की आशंका को देखते हुए यह कदम उठाया गया।


📊 क्यों जरूरी समझा गया कटऑफ कम करना?

🔹 कई राज्यों में पीजी सीटें भर नहीं पा रही थीं।
🔹 विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी को देखते हुए सीटें खाली रहना नुकसानदायक माना गया।
🔹 स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए अधिक डॉक्टरों को विशेषज्ञ प्रशिक्षण में शामिल करना आवश्यक समझा गया।


🖋️ सरकारी कलम की टिप्पणी

नीट पीजी कटऑफ को लेकर देशभर में बहस छिड़ी हुई है। एक ओर मरीजों की सुरक्षा और चिकित्सा गुणवत्ता को लेकर चिंता जताई जा रही है, तो दूसरी ओर सरकार का तर्क है कि यह केवल मेरिट आधारित सीट आवंटन प्रक्रिया है, न कि योग्यता निर्धारण परीक्षा।

यदि सीटें खाली रह जाती हैं तो विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी और बढ़ सकती है। ऐसे में नीति-निर्माताओं के सामने चुनौती है — गुणवत्ता और उपलब्धता के बीच संतुलन बनाए रखना।

👉 अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी है, जो इस विवाद को दिशा देगा।


🖋️ सरकारी कलम – शिक्षा, स्वास्थ्य और नीतियों से जुड़ी हर महत्वपूर्ण खबर के साथ।

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