एक ही समय में अनेक प्रशासनिक कार्यों का दबाव📚 बेसिक शिक्षा:क्या कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों का नियमित शिक्षण महत्वपूर्ण नहीं है?

📚 बेसिक शिक्षा: ‘उपलब्ध संसाधन’ नहीं, भविष्य निर्माण की नींव

उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में एक गंभीर प्रश्न बार-बार सिर उठाता है—क्या बेसिक शिक्षा के शिक्षक केवल प्रशासनिक जरूरतों को पूरा करने का माध्यम हैं, या वे सचमुच भविष्य निर्माण की सबसे अहम कड़ी हैं?

वास्तविक समस्या संसाधनों की कमी से अधिक सोच की कमी है। वर्षों से देखा जा रहा है कि जहाँ भी अतिरिक्त मानव संसाधन की आवश्यकता पड़ी, सबसे पहले बेसिक शिक्षा के शिक्षकों को लगाया गया। कभी चुनाव ड्यूटी, कभी जनगणना, कभी सर्वेक्षण, कभी विशेष गहन पुनरीक्षण, कभी बीएलओ कार्य और अब बोर्ड परीक्षाओं की ड्यूटी।

सवाल यह नहीं कि ये कार्य महत्वपूर्ण नहीं हैं।
सवाल यह है कि क्या कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों का नियमित शिक्षण महत्वपूर्ण नहीं है?


🎯 प्राथमिक शिक्षा क्यों है सबसे संवेदनशील स्तर?

प्राथमिक स्तर वह नींव है जिस पर पूरी शिक्षा प्रणाली की इमारत खड़ी होती है।

  • यहीं बच्चे भाषा की बुनियाद सीखते हैं।
  • यहीं गणित की प्रारंभिक समझ विकसित होती है।
  • यहीं अनुशासन, आत्मविश्वास और सामाजिक व्यवहार की नींव रखी जाती है।

यदि इसी स्तर पर बार-बार व्यवधान उत्पन्न होंगे, तो उच्च शिक्षा तक उसका असर साफ दिखाई देगा।

कागजों में विद्यालय खुले रहते हैं, लेकिन कक्षाओं में शिक्षण का प्रवाह टूट जाता है। जिन बच्चों को सबसे अधिक मार्गदर्शन की आवश्यकता है, वही सबसे अधिक उपेक्षित हो जाते हैं।


📊 एक साथ कई अभियानों का दबाव

विडंबना यह है कि कई बार एक ही समय में अनेक प्रशासनिक कार्यों का दबाव बना दिया जाता है—

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  • विशेष गहन पुनरीक्षण
  • पंचायत पुनरीक्षण
  • बीएलओ कार्य
  • बोर्ड परीक्षा ड्यूटी

परिणामस्वरूप प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक उपलब्धता गंभीर रूप से प्रभावित होती है। यह स्थिति शिक्षा की गुणवत्ता पर सीधा प्रहार करती है।


🏫 बोर्ड परीक्षा प्रबंधन पर पुनर्विचार की आवश्यकता

यह विचारणीय है कि जब माध्यमिक स्तर पर सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी विद्यालयों की पर्याप्त संख्या मौजूद है, तो परीक्षा प्रबंधन की जिम्मेदारी उसी स्तर पर सुदृढ़ क्यों नहीं की जाती?

भले ही 20-30 प्रतिशत विद्यालय परीक्षा केंद्र बनते हों, लेकिन पर्यवेक्षण और प्रबंधन का दायित्व उसी स्तर के शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच संतुलित रूप से बाँटा जा सकता है।

हर बार बेसिक शिक्षा को थोक के भाव झोंक देना प्रशासनिक सुविधा हो सकती है, लेकिन यह शैक्षिक दूरदर्शिता नहीं है।


🧠 मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी उतना ही गंभीर

जब बार-बार बेसिक शिक्षकों को हर अतिरिक्त कार्य के लिए सबसे पहले चुना जाता है, तो यह संदेश जाता है कि उनका मूल कार्य—शिक्षण—प्राथमिकता में नहीं है।

इसका प्रभाव केवल कार्य-संतोष पर ही नहीं पड़ता, बल्कि प्राथमिक शिक्षा की सामाजिक प्रतिष्ठा भी कमजोर होती है। शिक्षक यदि स्वयं सम्मानित और स्थिर महसूस नहीं करेगा, तो वह बच्चों में आत्मविश्वास कैसे भर पाएगा?


⚖️ समाधान क्या हो सकते हैं?

अब समय आ गया है कि नीति स्तर पर गंभीर चिंतन किया जाए—

  1. स्वतंत्र परीक्षा प्रबंधन तंत्र
    बोर्ड परीक्षाओं के लिए एक प्रशिक्षित, स्थायी और अलग प्रशासनिक ढांचा विकसित किया जाए।
  2. समय-सारिणी का समन्वय
    विभिन्न विभागों के प्रशासनिक और निर्वाचन कार्यों की योजना इस प्रकार बनाई जाए कि प्राथमिक शिक्षा बाधित न हो।
  3. मूल कार्य के प्रति जवाबदेही
    प्रत्येक विभाग को उसके मूल दायित्व के प्रति उत्तरदायी बनाया जाए।
  4. प्राथमिक शिक्षा को नीति की प्राथमिकता
    यह स्पष्ट किया जाए कि बेसिक शिक्षा “उपलब्ध मानव संसाधन” नहीं, बल्कि “राष्ट्रीय भविष्य” है।

⚠️ कानपुर की दुखद घटना: एक संवेदनशील समाज की आवश्यकता

इसी बीच कानपुर के साढ़ थाना क्षेत्र के चिरली गांव में एक दर्दनाक घटना सामने आई। दरोगा (UPSI) बनने का सपना संजो रही एक छात्रा ने संदिग्ध परिस्थितियों में फांसी लगाकर अपनी जान दे दी।

बताया गया कि वह प्रयागराज में रहकर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही थी और हाल ही में घर लौटी थी। पुलिस को मौके से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है, जिससे कारणों पर संशय बना हुआ है।

यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि प्रतिस्पर्धा, सामाजिक दबाव और मानसिक तनाव के बीच युवाओं को कितना मजबूत भावनात्मक सहारा मिल पा रहा है?

📌 हमें यह समझना होगा कि शिक्षा केवल परीक्षा और परिणाम तक सीमित नहीं है।
📌 मानसिक स्वास्थ्य, संवाद और संवेदनशील पारिवारिक वातावरण उतने ही आवश्यक हैं।

यदि आपके आसपास कोई छात्र या युवा मानसिक तनाव से जूझ रहा है, तो उसे अकेला न छोड़ें। संवाद ही सबसे बड़ा सहारा है।


✍️ निष्कर्ष

बोर्ड परीक्षा का सुचारु संचालन महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण वह छोटा बच्चा है जो रोज कक्षा में बैठकर अपने शिक्षक की प्रतीक्षा करता है।

प्रशासनिक सुविधा और शैक्षिक प्राथमिकता के बीच संतुलन बनाना ही अब सबसे बड़ी आवश्यकता है।

यदि व्यवस्था सचमुच शिक्षा सुधार को लेकर गंभीर है, तो उसे यह स्वीकार करना होगा कि बेसिक शिक्षा “मानव संसाधन” नहीं, बल्कि “राष्ट्र निर्माण का आधार” है।

जब यह समझ नीति का हिस्सा बनेगी, तभी प्राथमिक विद्यालयों में स्थिरता, सम्मान और गुणवत्ता का वातावरण बन सकेगा।


✍️ सरकारी कलम
शिक्षकों की आवाज, शिक्षा का सम्मान 📚✨

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