⚖️ इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला📌 25 वर्ष से अधिक आयु की विवाहित पुत्री को भी मिल सकती है पारिवारिक पेंशन


⚖️ इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

📌 25 वर्ष से अधिक आयु की विवाहित पुत्री को भी मिल सकती है पारिवारिक पेंशन

इलाहाबाद।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए 25 वर्ष से अधिक आयु की विवाहित पुत्री को पारिवारिक पेंशन न देने संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने इसे कानून और वर्तमान शासनादेशों के विपरीत मानते हुए संबंधित अधिकारी को याची के पक्ष में निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया ने अनुराधा अहिरवार बनाम राज्य सरकार व अन्य मामले में पारित किया है।


🧑‍🏫 क्या है पूरा मामला?

याची अनुराधा अहिरवार
➡️ उच्च प्राथमिक विद्यालय, फर्रुखाबाद में
➡️ प्रधानाध्यापिका पद पर कार्यरत हैं।

उनकी माता दुर्गा अहिरवार, जो शिक्षा विभाग में कार्यरत थीं,
📅 वर्ष 2013 में उनका निधन हो गया।

माता की मृत्यु के बाद याची ने
➡️ पारिवारिक पेंशन के लिए आवेदन किया,
लेकिन बीएसए फर्रुखाबाद ने—

1989 के शासनादेश का हवाला देते हुए
❌ यह कहकर पेंशन देने से इनकार कर दिया कि—

“याची की आयु 33 वर्ष है, जबकि पारिवारिक पेंशन अधिकतम 25 वर्ष या विवाह तक ही मान्य है।”


⚖️ हाईकोर्ट ने क्यों रद्द किया बीएसए का आदेश?

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

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📌 बीएसए द्वारा
➡️ पुराने शासनादेश (1989) को आधार बनाना
➡️ गलत और अवैध है।

कोर्ट ने अपने फैसले में—

✔️ हसीना बी केस
✔️ 2008 का शासनादेश
✔️ 2012 का शासनादेश

का हवाला देते हुए कहा कि—

👉 पुत्री, चाहे विवाहित हो या अविवाहित,
👉 यदि वह अन्यथा पात्र है,
👉 तो उसे पारिवारिक पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता


🧾 कोर्ट का स्पष्ट आदेश

न्यायालय ने—

❌ बीएसए फर्रुखाबाद का आदेश निरस्त करते हुए
➡️ संबंधित प्राधिकारी को निर्देश दिया है कि—

📌 याची के पारिवारिक पेंशन के दावे पर पुनः विचार कर
📌 कानून के अनुरूप निर्णय लिया जाए


📢 क्यों है यह फैसला महत्वपूर्ण?

यह निर्णय—

✔️ महिला कर्मचारियों की संतानों के अधिकार को मजबूत करता है
✔️ पुराने और भेदभावपूर्ण शासनादेशों पर रोक लगाता है
✔️ शिक्षा विभाग सहित सभी सरकारी विभागों के लिए नज़ीर (Precedent) बनेगा

📌 इससे ऐसे कई मामलों में राहत मिलने की संभावना है,
जहां विवाहित पुत्रियों को केवल उम्र या विवाह के आधार पर पारिवारिक पेंशन से वंचित किया जा रहा था


✍️ निष्कर्ष: अधिकार उम्र से नहीं, कानून से तय होते हैं

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला साफ संदेश देता है कि—

⚖️ कानून समय के साथ विकसित होता है
❌ पुराने आदेशों की आड़ में
❌ पात्र व्यक्तियों के अधिकार छीने नहीं जा सकते।

📢 सरकारी कलम
शिक्षक और कर्मचारी हितों से जुड़े
हर महत्वपूर्ण न्यायिक फैसले को
👉 सरल भाषा में
👉 सही कानूनी संदर्भ के साथ
आप तक पहुंचाता रहेगा।

✍️ – सरकारी कलम ब्यूरो
🌐 www.sarkarikalam.com

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