⚖️ जल्दबाजी में आदेश पारित करना अनुचित, इससे जनता का न्यायपालिका पर विश्वास घटता है : इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि अदालतों को ऐसे किसी भी कार्य से बचना चाहिए, जिससे आम जनता का पवित्र न्यायिक संस्था से विश्वास कम हो। यदि किसी मामले में सर्वोच्च न्यायालय का आदेश आने वाला हो, तो उसकी प्रमाणिक प्रति का इंतजार करना न्यायिक अनुशासन का हिस्सा है।
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि हाईकोर्ट के पूर्व आदेश के पालन में एक-दो दिन की देरी भी हो जाती, तो इससे “आसमान नहीं टूट पड़ता।”
👨⚖️ न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की अहम टिप्पणी
न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की एकल पीठ ने यह टिप्पणी हामिद और दो अन्य आरोपियों द्वारा दाखिल पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए दी। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा 17 अगस्त 2024 को जारी समन आदेश को रद्द कर दिया।
साथ ही, ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह 31 मार्च 2026 तक सभी पक्षों को सुनकर नया आदेश पारित करे।
🔎 पूरा मामला क्या है?
- 📍 मेरठ के मुंडाली थाना क्षेत्र में
- 📅 19 मई 2020 को
- 🔫 दो व्यक्तियों की हत्या हुई थी
इस मामले में हामिद और दो अन्य लोगों को आरोपी बनाया गया था। हालांकि, पुलिस जांच के बाद इनके नाम चार्जशीट से हटा दिए गए।
इसके बाद वादी पक्ष ने सीआरपीसी की धारा-319 के तहत आवेदन देकर इन तीनों को दोबारा मुकदमे में शामिल करने की मांग की, जिसे ट्रायल कोर्ट ने स्वीकार कर समन जारी कर दिया।
📜 क्या है सीआरपीसी की धारा-319?
👉 सीआरपीसी की धारा-319 (अब बीएनएसएस की धारा-258) अदालत को यह शक्ति देती है कि
यदि ट्रायल के दौरान किसी ऐसे व्यक्ति की संलिप्तता के प्रमाण सामने आते हैं,
- जिसका नाम न एफआईआर में हो
- और न ही आरोप पत्र में
तो अदालत उसे आरोपी के रूप में तलब कर सकती है।
⚠️ लेकिन यह शक्ति अत्यंत सावधानी और ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही प्रयोग की जानी चाहिए।
⚠️ ट्रायल कोर्ट की जल्दबाजी पर सवाल
याचियों की ओर से दलील दी गई कि
- 🗓️ 14 अगस्त 2024 को सर्वोच्च न्यायालय ने संबंधित एसएलपी का निपटारा कर दिया था
- इसकी जानकारी ट्रायल कोर्ट को दे दी गई थी
- बताया गया था कि आदेश अपलोड होने वाला है
इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने आदेश की प्रतीक्षा किए बिना 17 अगस्त को समन जारी कर दिया, जो न्यायिक जल्दबाजी का उदाहरण है।
साथ ही यह भी कहा गया कि गवाहों की जिरह में विरोधाभास होने के बावजूद आरोपियों को तलब किया गया।
⚖️ वादी पक्ष की दलील
वादी पक्ष के अधिवक्ता ने कहा कि
- यह दोहरा हत्याकांड है
- आरोपियों के नाम मूल एफआईआर में दर्ज थे
- केवल स्वतंत्र गवाहों के आधार पर नाम हटाना गलत था
- आरोपियों ने सीधे फायरिंग की थी, इसलिए मुकदमा चलना आवश्यक है
🏛️ हाईकोर्ट का सख्त रुख
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि
सीआरपीसी की धारा-319 के तहत शक्ति का प्रयोग अत्यधिक सतर्कता से होना चाहिए।
कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की प्रतीक्षा किए बिना जल्दबाजी में निर्णय लिया, जो न्यायिक मर्यादा के विपरीत है।
✅ परिणामस्वरूप:
- ✔️ पुनरीक्षण याचिका स्वीकार
- ❌ 17 अगस्त 2024 का समन आदेश रद्द
- 🔁 नया आदेश पारित करने का निर्देश
📝 निष्कर्ष (सरकारी कलम की टिप्पणी)
यह फैसला एक बार फिर याद दिलाता है कि
⚖️ न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए।
अदालतों की छोटी-सी जल्दबाजी भी जनता के मन में न्याय व्यवस्था को लेकर संदेह पैदा कर सकती है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय न्यायिक संयम और संस्थागत गरिमा का सशक्त संदेश देता है।
📌 ऐसी ही महत्वपूर्ण न्यायिक, प्रशासनिक और शिक्षक-हित से जुड़ी खबरों के लिए जुड़े रहें —
👉 सरकारी कलम | www.sarkarikalam.com
