⚖️ उन्नाव दुष्कर्म मामला: सुप्रीम कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर को राहत देने पर लगाई रोक, कहा – “विधायक लोकसेवक क्यों नहीं?”
दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने 2017 के बहुचर्चित उन्नाव दुष्कर्म मामले में भाजपा के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को बड़ी राहत देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने सेंगर की उम्रकैद की सजा निलंबित कर जमानत देने का आदेश दिया था, जिस पर अब शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि सेंगर को रिहा नहीं किया जाएगा।
यह आदेश सीबीआई की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने सेंगर को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश भी दिया है।
👩⚖️ अवकाशकालीन पीठ ने दिया अहम आदेश
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की अवकाशकालीन पीठ ने सोमवार को इस मामले की सुनवाई की।
सीबीआई की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि यह नाबालिग से दुष्कर्म का अत्यंत गंभीर मामला है और ऐसे अपराध में दोषी को जमानत देना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
पीठ ने दलीलें सुनने के बाद कहा 👉
“इस मामले में कानून से जुड़े बेहद अहम सवाल उठते हैं, जिनकी गहराई से जांच जरूरी है।”
🔍 लोकसेवक की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
सुप्रीम कोर्ट ने लोकसेवक (Public Servant) की परिभाषा को लेकर हाईकोर्ट की व्याख्या पर गंभीर सवाल उठाए।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा 👇
“यह कैसे हो सकता है कि एक पुलिस कांस्टेबल को लोकसेवक माना जाए, लेकिन विधायक या सांसद को इस दायरे से बाहर रखा जाए?”
उन्होंने यह भी कहा कि हाईकोर्ट का आदेश देने वाले जज देश के बेहतरीन जजों में गिने जाते हैं, लेकिन गलती किसी से भी हो सकती है।
🚨 “आज भी मिल रही हैं धमकियां” – पीड़िता का दर्द
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए पीड़िता ने कहा 👇
“मुझे सुप्रीम कोर्ट से न्याय मिला है, लेकिन मेरी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।
जब तक सेंगर को फांसी नहीं होती, मुझे और मेरे परिवार को चैन नहीं मिलेगा।
आज भी हमें धमकियां मिल रही हैं।”
पीड़िता ने इसे पूरी जीत नहीं, बल्कि थोड़ी राहत बताया।
🏛️ पॉक्सो कानून पर भी होगी अहम सुनवाई
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हाईकोर्ट ने यह मानने में गलती की कि पॉक्सो एक्ट के तहत गंभीर अपराध की धाराएं लागू नहीं होंगी क्योंकि सेंगर को सरकारी कर्मचारी नहीं माना गया।
मेहता ने तर्क दिया 👉
“पॉक्सो कानून में लोकसेवक की अलग परिभाषा नहीं है, लेकिन इसका अर्थ प्रभावशाली पद पर बैठे व्यक्ति से है।
अपराध के समय सेंगर एक बाहुबली विधायक था, जिससे अपराध और भी गंभीर हो जाता है।”
वहीं, सेंगर के वकीलों ने दलील दी कि जब तक कानून में स्पष्ट प्रावधान न हो, विधायक को सरकारी कर्मचारी नहीं माना जा सकता।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि—
✔️ सेंगर को फिलहाल रिहा नहीं किया जाएगा
✔️ लोकसेवक की परिभाषा पर विस्तृत सुनवाई होगी
✔️ पीड़िता को अलग से याचिका दायर करने का पूरा अधिकार है
✍️ सरकारी कलम की टिप्पणी
यह फैसला न सिर्फ एक मामले तक सीमित है, बल्कि यह सत्ता, प्रभाव और कानून के बीच की दूरी को भी उजागर करता है। यदि विधायक और सांसद लोकसेवक नहीं माने जाएंगे, तो न्याय व्यवस्था पर इसका दूरगामी असर पड़ेगा।
📌 न्याय तभी पूर्ण होगा, जब कानून सबके लिए समान होगा।
