📺 बेसिक समायोजन : वेब सीरीज़ – सीज़न 3
शिक्षा व्यवस्था पर एक व्यंग्यात्मक लेकिन सच्ची कहानी
शिक्षा व्यवस्था में जब नीतियाँ ज़मीन से ज़्यादा फाइलों में चलने लगें,
तो परिणाम किसी वेब सीरीज़ से कम नहीं होते।
बेसिक समायोजन – सीज़न 3 भी कुछ ऐसा ही दृश्य प्रस्तुत करता है,
जहाँ हर एपिसोड में नया ट्विस्ट और हर किरदार मजबूर नज़र आता है। 🎭
🎬 दृश्य 1 : हुक्म का ऐलान
दरबार सजा है, कुर्सियाँ तनी हुई हैं।
मालिक का फरमान गूंजता है—
“समायोजन होगा! प्रदेश के सभी विद्यालय शिक्षकों से भर दिए जाएँ।”
हुक्मरान तुरंत कमान संभालते हैं—
“जी हुजूर, अभी करता हूँ।”
और यहीं से कहानी रफ्तार पकड़ लेती है। 🚀
📋 दृश्य 2 : आनन-फानन की सूची
किन विद्यालयों में शिक्षक कम हैं,
इसकी सूची आनन-फानन में जारी होती है।
आदेश साफ है—
“घोड़े दौड़ाओ!
जहाँ भी मास्टर दिखे,
उठाओ और खाली विद्यालयों में भर दो।” 🐎
📰 हेडलाइन का जादू
अगले ही दिन अख़बारों की सुर्खियाँ चमकती हैं—
“ऐतिहासिक कदम!
महोदय ने प्रदेश के सभी स्कूलों को पूरी तरह संतृप्त कर दिया।” ✨
तालियाँ बजती हैं,
नीति सफल घोषित हो जाती है,
लेकिन कहानी अभी बाकी है।
🎒 दृश्य 3 : बेचारा मास्टर
बोरिया-बिस्तर बाँधता मास्टर,
हाथ में झउआ भर काग़ज़ों का बंडल,
आज यहाँ… कल वहाँ…
एक स्कूल से दूसरे स्कूल की यात्रा। 🚶♂️
ना कारण स्पष्ट,
ना भविष्य तय—
बस आदेश का पालन।
⚠️ दृश्य 4 : अचानक सवाल
जश्न के बीच अचानक सवाल उठता है—
“हुजूर, जहाँ से मास्टर उठाए थे,
अब वहाँ तो खाली हो गया…
अब क्या किया जाए?” 😶
📜 दृश्य 5 : नया फरमान
दरबार फिर सजता है और आदेश आता है—
“सबको वहीं छोड़कर आओ
जहाँ से लाए थे,
और ऐसा करो कि
साँप भी मर जाए 🐍
और लाठी भी न टूटे।”
⚽ दृश्य 6 : फुटबॉल बना मास्टर
इन तमाम आदेशों के बीच
फुटबॉल बना मास्टर
मैदान में इधर-उधर
धक्के खाता रहता है।
और इस खेल में
नौनीहालों की शिक्षा
तमाशा बनकर रह जाती है। 🎓
❓ सवाल जो अनुत्तरित रह गए
ना स्पष्ट आदेश,
ना ठोस निर्देश,
ना जानकारी,
ना साइड इफेक्ट का आकलन।
बस एक अंधी दौड़—
क्योंकि आखिर में
मालिक खुश होने चाहिए। 🙂
🎭 बेसिक विभाग : रंगमंच बनता शिक्षा तंत्र
आज बेसिक विभाग
शिक्षा का मंदिर कम
और नौटंकी का रंगमंच ज़्यादा बनता जा रहा है।
कभी सीनियर,
कभी जूनियर,
कभी प्रयोग,
कभी भ्रम।
🙏 जय हो नीति नियंता!
जहाँ फैसले होते हैं फाइलों में,
लेकिन असर पड़ता है
मास्टर और
मासूम बच्चों की ज़िंदगी पर।
यह लेख व्यंग्य है,
लेकिन सवाल बिल्कुल गंभीर।
नोट : यह लेख पूर्णतः काल्पनिक है एवं केवल सामान्य परिस्थितियों पर आधारित एक व्यंग्यात्मक प्रस्तुति है। इसका किसी भी व्यक्ति, अधिकारी, संस्था अथवा विभाग से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई संबंध नहीं है। इस लेख का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है, बल्कि व्यवस्था से जुड़े विषयों पर विचार प्रस्तुत करना मात्र है।
