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⚖️ केवल नैतिकता के आधार पर शिक्षक की बर्खास्तगी गलत, दंड पर हो पुनर्विचार : इलाहाबाद हाईकोर्ट
शिक्षकों से जुड़े एक अहम फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल नैतिकता के उल्लंघन के आधार पर किसी शिक्षक को सेवा से बर्खास्त करना अत्यधिक कठोर दंड है, खासकर तब जब मामला आपसी सहमति से बने संबंधों से जुड़ा हो।
यह टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने एमएनएनआईटी प्रयागराज के पूर्व लेक्चरर की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया है।
👨⚖️ दंड की मात्रा पर पुनर्विचार का आदेश
न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने मामले में कहा कि
👉 दंड की मात्रा अपराध की गंभीरता के अनुपात में होनी चाहिए।
कोर्ट ने शिक्षक को सेवा से हटाने के आदेश को निरस्त करते हुए मामला अनुशासनिक प्राधिकारी को वापस भेज दिया है, ताकि दंड पर पुनर्विचार किया जा सके।
🏫 क्या है पूरा मामला?
- वर्ष 1999-2000 में याची की नियुक्ति एमएनएनआईटी प्रयागराज के कंप्यूटर साइंस विभाग में लेक्चरर के पद पर हुई थी।
- एक छात्रा ने संस्थान छोड़ने के लगभग तीन साल बाद, जनवरी 2003 में शिकायत दर्ज कराई कि शिक्षक ने उसके साथ संबंध बनाए थे।
- शिक्षक ने स्वीकार किया कि उनके बीच आपसी सहमति से संबंध थे और वे विवाह करना चाहते थे, लेकिन परिस्थितियों के कारण विवाह नहीं हो सका।
📄 जांच रिपोर्ट के आधार पर हुई थी बर्खास्तगी
संस्थान ने मामले की जांच के लिए एक सदस्यीय जांच आयोग गठित किया था।
- जांच रिपोर्ट में शिक्षक को अनैतिक आचरण का दोषी ठहराया गया।
- इसी रिपोर्ट के आधार पर 28 फरवरी 2006 को शिक्षक को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
इसके बाद शिक्षक ने इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
🔍 कोर्ट ने किन बातों को माना अहम?
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान निम्न बिंदुओं को महत्वपूर्ण माना 👇
- छात्रा संस्थान छोड़ने के बाद भी करीब तीन साल तक शिक्षक के संपर्क में रही
- शिकायत तब दर्ज कराई गई जब शिक्षक की सगाई किसी अन्य स्थान पर तय हो गई
- मामले में कोई एफआईआर दर्ज नहीं कराई गई थी
- संबंध आपसी सहमति से होने की बात दोनों पक्षों ने स्वीकार की
इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने माना कि सीधे बर्खास्तगी जैसा कठोर दंड उचित नहीं है।
✍️ सरकारी कलम की राय
यह फैसला शिक्षण संस्थानों में अनुशासन और न्याय के संतुलन को लेकर बेहद महत्वपूर्ण है। सरकारी कलम का मानना है कि
👉 नैतिकता के नाम पर दिए जाने वाले दंड तर्कसंगत, अनुपातिक और न्यायसंगत होने चाहिए।
👉 शिक्षक-छात्र संबंधों में अनुशासन जरूरी है, लेकिन बिना आपराधिक आधार के आजीविका छीन लेना भी न्याय नहीं है।
यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में न्यायिक मार्गदर्शन का काम करेगा।
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