⚖️ चुनाव ड्यूटी के बाद कोविड में मृत्यु: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने DM का इनकार आदेश रद्द किया, विधवा को मुआवज़ा देने पर पुनर्विचार का निर्देश
— सरकारी कलम विशेष रिपोर्ट
कोविड-19 महामारी के दौरान चुनाव ड्यूटी करते हुए अपनी जान गंवाने वाले सरकारी कर्मचारियों के परिवारों को न्याय दिलाने की दिशा में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इटावा की दिवंगत शिक्षक कौशल किशोर की पत्नी राजकुमारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए डीएम द्वारा मुआवजा देने से इनकार किए गए आदेश को रद्द कर दिया है।
📝 मामला क्या था?
राजकुमारी के पति कौशल किशोर, बकेवर स्थित जनता इंटर कॉलेज में लेक्चरर थे। उन्हें
📌 19 अप्रैल 2021 को त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव–2021 की ड्यूटी पर तैनात किया गया था।
ड्यूटी पूरी करने के कुछ ही दिनों बाद उन्हें—
- तेज बुखार
- सांस लेने में कठिनाई
जैसे गंभीर लक्षण दिखे। जांच में कोरोना संक्रमण की पुष्टि हुई।
मई 2021 में सैफई मेडिकल कॉलेज ले जाते समय उनकी मृत्यु हो गई, जो कि ड्यूटी के 12 दिन के भीतर हुई।
💔 पत्नी ने मांगा मुआवजा, DM ने किया इनकार
कोविड काल में चुनाव ड्यूटी के दौरान हुई मृत्यु को लेकर राज्य सरकार ने ₹30 लाख मुआवजा देने का प्रावधान किया था।
लेकिन जब पत्नी राजकुमारी ने आवेदन किया तो
❌ डीएम ने मुआवज़ा देने से इनकार कर दिया।
यही आदेश उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी।
👨⚖️ हाईकोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने:
- डीएम के इनकार आदेश को रद्द कर दिया
- मामले में फिर से विचार करने को कहा
- और निर्देश दिया कि 👉 एक माह के भीतर मुआवज़े पर निर्णय लिया जाए
कोर्ट ने साफ कहा कि चुनाव ड्यूटी के दौरान कोविड संक्रमण से हुई मृत्यु को सरकार के आदेश के अनुसार गंभीरता से देखा जाना चाहिए।
🛡️ शिक्षक समाज के लिए बड़ी राहत
यह फैसला कोविड-19 चुनाव ड्यूटी में मारे गए सैकड़ों शिक्षकों के लिए आशा की किरण है।
कई परिवार अब भी मुआवज़े के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
हाईकोर्ट का यह आदेश यह स्पष्ट करता है कि
✔ ड्यूटी के दौरान हुई मौत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता
✔ डीएम स्तर पर मनमाना इनकार स्वीकार नहीं होगा
🟩 सरकारी कलम की राय
कोविड काल में चुनाव ड्यूटी पर गए कर्मचारी—विशेषकर शिक्षक—सबसे ज्यादा जोखिम में थे।
उनके परिवारों को न्याय देना सरकार और प्रशासन की ज़िम्मेदारी है।
हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल एक परिवार की जीत है, बल्कि उन सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए उम्मीद भी है जो चुनाव ड्यूटी में अपनी जान गंवा बैठे।
