⚖️ POCSO केस में बड़ा फैसला: हाईकोर्ट ने कहा—“दोषसिद्धि की संभावना नहीं, अदालत का समय बर्बाद न हो” 🙅♂️📜
✍️ सरकारी कलम | इलाहाबाद हाईकोर्ट | न्यायपालिका अपडेट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2017 में पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज हुए एक नाबालिग के कथित अपहरण व दुष्कर्म के मामले को रद्द करते हुए बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि इस केस में अब दोषसिद्धि की संभावना बेहद क्षीण है और ट्रायल जारी रखना सिर्फ अदालत के कीमती समय की बर्बादी होगी।
यह फैसला न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने दिया और आरोपी युवक व उसके परिजनों के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्रवाई को खत्म कर दिया।
📝 मामला क्या था?
मामला संतकबीर नगर के बखीरा थाना क्षेत्र का है।
- जनवरी 2017 में लड़की के पिता ने FIR दर्ज कराई थी
- आरोप: युवक नाबालिग बेटी को बहला-फुसलाकर ले गया
- बरामदगी के बाद लड़की ने बयान दिया:
✔️ वह बालिग है
✔️ अपनी इच्छा से युवक के साथ गई
✔️ निकाह करना चाहती है
फरवरी 2017 में मुख्य चिकित्साधिकारी की मेडिकल रिपोर्ट में लड़की की उम्र करीब 18 वर्ष पाई गई।
👨👩👦 कोर्ट में बड़ा मोड़: शादी और बच्चा
ट्रायल के दौरान—
- युवक और लड़की ने निकाह कर लिया
- अगस्त 2018 में बेटे का जन्म हुआ
- परिवार अब शांतिपूर्वक जीवन जी रहा है
- मध्यस्थता केंद्र में लड़की के पिता ने भी आपत्ति नहीं जताई
कोर्ट ने कहा—“जब परिवार पूरी तरह से स्थापित हो चुका है, तो न्यायालय वास्तविकताओं से आंखें नहीं मूंद सकता।”
🏛️ राज्य सरकार की दलील और कोर्ट का जवाब
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध रामजी लाल बैरवा केस का हवाला देते हुए कहा कि—
➡️ POCSO मामलों में समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता।
लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामला पूरी तरह अलग परिस्थितियों वाला है।
यहां—
✔️ लड़का-लड़की वयस्क हैं
✔️ वर्षों से साथ रह रहे हैं
✔️ परिवार बन चुका है
✔️ लड़की ने अपनी इच्छा से साथ जाने की बात कही
इसलिए ट्रायल जारी रखने से अन्याय और अनावश्यक उत्पीड़न होगा।
🔍 हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
कोर्ट ने स्पष्ट कहा—
“यदि कोई अपराध था भी, तो अब समय की धारा में धुल चुका है। आरोपी के दोषसिद्ध होने की संभावना अत्यंत दुर्लभ है। ऐसे मुकदमों को जारी रखना अदालत का समय बर्बाद करना होगा, विशेषकर तब जब अदालतें पहले से ही भारी बोझ झेल रही हैं।”
कोर्ट का यह बयान न्याय व्यवस्था में व्यावहारिकता और मानवता–दोनों को दर्शाता है।
🧾 फैसले का सार:
- ✔️ POCSO केस रद्द
- ✔️ शादी और बच्चा होने को कोर्ट ने “वास्तविकता” माना
- ✔️ दोषसिद्धि की संभावना नगण्य
- ✔️ मुकदमा जारी रखना अदालत के संसाधनों की बर्बादी
- ✔️ परिवार को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाने पर जोर
⭐ सरकारी कलम की टिप्पणी
यह फैसला दिखाता है कि अदालतें केवल कानूनी कागजों से नहीं, बल्कि जीवन की परिस्थितियों को देखकर भी निर्णय लेती हैं।
POCSO एक सख्त कानून है, लेकिन जहां आरोपों का आधार ही समाप्त हो चुका हो और परिवार खुशहाल जीवन जी रहा हो, वहां न्यायालय का यह कदम व्यावहारिक और मानवीय दोनों है।
