📰 हरियाणा पुलिस कांस्टेबल की ‘जबर्दस्ती रिटायरमेंट’ रद्द – हाई कोर्ट ने कहा, आवेदन वापस लेने का अधिकार कर्मचारी का है
✍️ By सरकारी कलम टीम
चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में हरियाणा पुलिस के कांस्टेबल प्रीतपाल की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (Voluntary Retirement) को अवैध घोषित करते हुए उसे सेवा में बहाल करने का आदेश दिया है।
जस्टिस सुदीप्ति शर्मा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि —
“किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का आवेदन तब तक प्रभावी नहीं होता, जब तक उसे विभाग द्वारा स्वीकार न किया गया हो। और कर्मचारी को यह अधिकार है कि वह स्वीकार किए जाने से पहले उसे वापस ले सके।”
📜 मामला क्या है?
नारनौल निवासी प्रीतपाल वर्ष 1989 में हरियाणा पुलिस विभाग में कांस्टेबल नियुक्त हुए थे।
- 9 सितंबर 2013 को उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन दिया।
- लेकिन 12 सितंबर 2013 को ही उन्होंने व्यक्तिगत कारणों से अपना आवेदन वापस लेने का अनुरोध कर दिया।
पुलिस अधीक्षक ने यह वापसी अर्जी 19 सितंबर 2013 को आईजी को भेज दी।
इसके बावजूद विभाग ने उनकी मूल सेवानिवृत्ति अर्जी को स्वीकार करते हुए 30 सितंबर 2013 को सेवानिवृत्त घोषित कर दिया।
⚖️ अदालतों की लड़ाई
प्रीतपाल ने इस आदेश को नारनौल सिविल कोर्ट में चुनौती दी।
- 16 जनवरी 2015: सिविल जज ने उनके पक्ष में फैसला दिया।
- लेकिन जिला जज नारनौल ने 5 फरवरी 2016 को राज्य सरकार की अपील स्वीकार करते हुए प्रीतपाल की राहत खारिज कर दी।
इसके बाद प्रीतपाल ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में अपील दायर की।
⚖️ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
हाई कोर्ट ने पाया कि —
- प्रीतपाल ने सेवानिवृत्ति आवेदन सिर्फ तीन दिन के भीतर ही वापस ले लिया था।
- विभाग ने इस वापसी अर्जी पर कोई निर्णय लिए बिना ही सेवानिवृत्ति आदेश जारी कर दिया।
जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने कहा —
“यह प्रक्रिया कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है। जब आवेदन स्वीकार ही नहीं हुआ था, तो कर्मचारी की सेवानिवृत्ति वैध नहीं मानी जा सकती।”
अदालत ने जिला जज नारनौल के आदेश को रद्द करते हुए, सिविल कोर्ट के 2015 के निर्णय को फिर से बहाल कर दिया और निर्देश दिया कि
👉 प्रीतपाल को तत्काल प्रभाव से सेवा में पुनर्नियुक्त किया जाए।
🧩 फैसला क्यों अहम है?
यह फैसला न केवल हरियाणा पुलिस के लिए बल्कि सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए एक कानूनी मिसाल (precedent) बन गया है।
अब स्पष्ट है कि —
✅ जब तक विभाग किसी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति आवेदन को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं करता,
✅ कर्मचारी को उसे वापस लेने का पूर्ण अधिकार रहता है।
📢 “सरकारी कलम” की राय
यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों को मज़बूती देता है।
विभागीय मनमानी और जल्दबाज़ी में लिए गए निर्णयों से कई बार कर्मचारियों का भविष्य दांव पर लग जाता है।
न्यायालय का यह आदेश न केवल कानूनी स्पष्टता लाता है, बल्कि न्यायिक संवेदनशीलता का भी उदाहरण है।
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