⚖️ सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख : “फैसला देने के बाद अमल में सालों लगें, तो यह न्याय का मज़ाक है”
देशभर में 8.8 लाख निष्पादन याचिकाएं लंबित — सुप्रीम कोर्ट ने जताई कड़ी नाराज़गी 😠
देश की अदालतों में लाखों लोगों के हक़ में फ़ैसले तो आ चुके हैं, लेकिन उन पर अमल नहीं हो पा रहा है।
नतीजा — न्याय पाने वाले नागरिक अब न्याय के इंतज़ार में फिर अदालतों के चक्कर काट रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति को “खतरनाक और बेहद निराशाजनक” बताया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर किसी डिक्री (Court Order) को लागू कराने में वर्षों लगते हैं, तो यह न्याय का उपहास है।
📊 8.82 लाख निष्पादन याचिकाएं लंबित
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार देशभर की अदालतों में अभी भी 8,82,578 निष्पादन याचिकाएं (Execution Petitions) लंबित हैं।
हालांकि, मार्च 2025 में अदालत के निर्देश के बाद 3.38 लाख याचिकाओं का निपटारा किया जा चुका है।
फिर भी इतनी बड़ी संख्या में याचिकाओं का लंबित रहना न्याय व्यवस्था की गंभीर चुनौती मानी जा रही है।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट का आदेश — छह महीने में करें निपटारा
जस्टिस जे.बी. पार्डीवाला और जस्टिस पंकज मित्तल की पीठ ने 16 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान कहा —
“यदि अदालत का आदेश लागू कराने में वर्षों लगते हैं, तो उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता।”
सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्टों को निर्देश दिया है कि वे जिला न्यायपालिकाओं को मार्गदर्शन दें और छह महीने के भीतर लंबित याचिकाओं का निपटारा सुनिश्चित करें।
🏛️ जवाबदेही तय होगी
कोर्ट ने साफ कहा है कि यदि निर्धारित समय में याचिकाएं निपटाई नहीं गईं, तो संबंधित जिला न्यायाधीश हाई कोर्ट के प्रति जवाबदेह होंगे।
कर्नाटक हाई कोर्ट द्वारा आंकड़े न भेजने पर सुप्रीम कोर्ट ने वहां के रजिस्ट्रार जनरल से दो हफ्ते में स्पष्टीकरण मांगा है।
📅 अगली सुनवाई 10 अप्रैल को
सुप्रीम कोर्ट ने अब सभी हाई कोर्टों से 10 अप्रैल, 2026 तक प्रगति रिपोर्ट मांगी है —
जिसमें लंबित और निपटाई गई याचिकाओं का पूरा ब्योरा शामिल करना होगा।
कोर्ट ने कहा कि न्याय तभी सार्थक है जब उसका अमल भी समय पर हो।
🗣️ “सरकारी कलम” की राय ✍️
भारत में “फैसले मिलने” और “न्याय मिलने” में अभी भी लंबा फासला है।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश न केवल अदालतों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि —
“न्याय में देरी, न्याय से इनकार के बराबर है।” ⚖️
