ये दोनों मामले बेहद गंभीर और चौंकाने वाले फर्जीवाड़े हैं 👇
1️⃣ मेरठ : 33 साल तक फर्जी शिक्षक!
- नाम : विष्णुदत्त शर्मा
- स्कूल : घिटौली का संविलियन विद्यालय
- नियुक्ति : 31 दिसम्बर 1991 को “मृतक आश्रित” कोटे में सहायक अध्यापक के रूप में
- असलियत : जांच में सामने आया कि उनके पिता बाबूराम शर्मा कभी शिक्षक थे ही नहीं।
- सच्चाई उजागर : पिलाना के श्यामसुंदर और जगवीर ने शिकायत की थी।
- पदोन्नति : 15 साल पहले प्रधानाध्यापक बने और घिटौली स्कूल में आ गए।
- बीएसए गीता चौधरी की जांच : पूरे मामले को सही पाया और अब उनकी सेवा समाप्त कर दी गई है।
👉 यानी 33 साल तक बच्चों को पढ़ाने वाला व्यक्ति शिक्षक था ही नहीं। यह न सिर्फ़ शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है बल्कि विभागीय तंत्र की ढीली निगरानी को भी उजागर करता है।
2️⃣ आगरा : मृतक आश्रित कोटे से दो सगे भाई पुलिस में
- नाम :
- नागमेंद्र लांबा (एसीपी, अकाउंट – सेवानिवृत्त)
- योगेंद्र लांबा (इंस्पेक्टर)
- फर्जीवाड़ा : दोनों भाइयों ने मृतक आश्रित कोटे से नौकरी ले ली, जबकि यह सुविधा सिर्फ़ एक वारिस को दी जा सकती है।
- शिकायत : किसी ने एसीपी नागमेंद्र लांबा के सेवानिवृत्त होने के बाद पेंशन प्रक्रिया में शिकायत की।
- परिणाम : पेंशन और भुगतान रोक दिए गए।
- जांच :
- प्रारंभिक जांच डीसीपी यातायात अभिषेक अग्रवाल को दी गई थी।
- शिकायत पुलिस मुख्यालय और पूर्व पुलिस आयुक्त जे. रविन्दर गौड़ के पास भी पहुंची थी।
- संभावना : जांच पूरी होने पर केस दर्ज कराया जा सकता है।
👉 यह मामला दिखाता है कि पुलिस विभाग जैसी सख्त सेवा में भी फर्जी मृतक आश्रित नियुक्तियां संभव हो गईं।
🔎 सार
- मेरठ में शिक्षा विभाग और आगरा में पुलिस विभाग, दोनों जगह मृतक आश्रित नियमों का गलत फायदा उठाकर नौकरी हथियाई गई।
- ये मामले सिर्फ़ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि ईमानदार अभ्यर्थियों और असली आश्रितों के हक पर डाका हैं।
- अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने सालों तक ये फर्जीवाड़े पकड़े क्यों नहीं गए?
