एक्स-रे टेक्नीशियन भर्ती में महाघोटाला: 79 चयनित, पर 140 ने थाम ली नौकरी 😱
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग की पुरानी भर्तियों का काला चिट्ठा एक-एक कर सामने आ रहा है। वर्ष 2016 में एक्स-रे टेक्नीशियन भर्ती घोटाले का पर्दाफाश होने के बाद अब वर्ष 2008 की भर्ती में भी भारी फर्जीवाड़ा सामने आया है।
ताज़ा खुलासे में यह पाया गया है कि 2008 में चयन सूची में केवल 79 अभ्यर्थी सफल घोषित हुए थे, लेकिन कार्यभार 140 लोगों ने ग्रहण कर लिया। यानी लगभग 61 लोगों ने फर्जी तरीके से नौकरी पा ली।
कैसे हुआ फर्जीवाड़ा?
- वर्ष 2008 में 92 पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू हुई।
- 27 से 29 जुलाई 2008 तक चिकित्सा स्वास्थ्य महानिदेशालय (स्वास्थ्य भवन, लखनऊ) में साक्षात्कार हुए।
- चयन समिति ने केवल 79 अभ्यर्थियों को योग्य पाया और सूची जारी कर दी।
- सूची के आधार पर अभ्यर्थियों ने अगस्त–सितंबर 2008 में कार्यभार ग्रहण किया।
- लेकिन मानव संपदा पोर्टल से मिलान करने पर पाया गया कि 2008–2009 के बीच 140 लोगों ने कार्यभार ग्रहण किया।
👉 जबकि उस दौरान कोई दूसरी भर्ती प्रक्रिया नहीं चली थी, इसका मतलब साफ है कि भ्रष्टाचार और मिलीभगत से फर्जी नियुक्तियां की गईं।
हर साल 3.66 करोड़ का नुकसान 💰
यदि 17 साल के अनुभव वाले एक्स-रे टेक्नीशियन का औसत वेतन ₹50,000 प्रतिमाह मान लिया जाए तो:
- फर्जी नियुक्त 61 लोग हर साल सरकार पर लगभग ₹3.66 करोड़ का अतिरिक्त बोझ डाल रहे हैं।
- अब तक यानी 17 वर्षों में यह रकम सैकड़ों करोड़ तक पहुंच चुकी है।
सीएचसी में पद से अधिक तैनाती
फर्जी नियुक्तियों की हद यह है कि जिन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) पर केवल 1–2 पद स्वीकृत थे, वहां 5–8 तक टेक्नीशियन तैनात कर दिए गए।
केस-1: बलिया (सोनवरसा सीएचसी)
- 20 सितंबर से 16 अक्तूबर 2008 के बीच यहां 9 एक्स-रे टेक्नीशियन ने कार्यभार ग्रहण किया।
- इनमें अरविंद सिंह, धीरेंद्र सिंह, हरनाथ सिंह, पुरुषोत्तम कुमार, पुष्पेंद्र सिंह, सुरेंद्र सिंह, विकास कुमार, जगतपाल सिंह और योगेंद्र कुमार शामिल रहे।
- कुछ ही दिन बाद इनका तबादला अन्य जिलों में कर दिया गया।
केस-2: मथुरा (बलदेव सीएचसी)
- 16 अक्तूबर 2008 से 25 जून 2009 तक यहां 4 टेक्नीशियन ने कार्यभार ग्रहण किया।
- इनमें राघवेंद्र राजपूत, रवि कुमार, सुरेंद्र सिंह (पुत्र गंगा सिंह) और सुरेंद्र सिंह (पुत्र श्रीपाल) शामिल हैं।
- इन सभी के नाम चयन सूची में नहीं थे। बाद में इनका भी तबादला अन्य जिलों में हो गया।
विभागीय मिलीभगत पर सवाल ⁉️
- तत्कालीन महानिदेशक डॉ. आईएस श्रीवास्तव और निदेशक (पैरामेडिकल) डॉ. राजेंद्र प्रसाद के हस्ताक्षर से नियुक्ति पत्र जारी हुए।
- नियुक्ति पत्रों के पन्नों पर चयन सूची और वास्तविक कार्यभार ग्रहण करने वालों में स्पष्ट अंतर है।
- इससे यह आशंका गहरी हो गई है कि डिग्रियां भी फर्जी हो सकती हैं।
जिम्मेदारों की सफाई
वर्तमान महानिदेशक, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य डॉ. रतनपाल सिंह सुमन का कहना है:
“मामले की जानकारी नहीं है। यदि किसी ने गलत तरीके से नौकरी हासिल की है तो जांच कराई जाएगी और दोषियों पर कार्रवाई होगी।”
निष्कर्ष ✍️
यह मामला दिखाता है कि स्वास्थ्य विभाग में भर्ती प्रक्रिया किस कदर भ्रष्टाचार और मिलीभगत की भेंट चढ़ी रही है।
- जहाँ योग्य 79 उम्मीदवारों को नौकरी मिलनी थी, वहां 140 लोग तैनात हो गए।
- सरकार को हर साल करोड़ों का नुकसान हो रहा है।
- सवाल यह है कि 17 साल से नौकरी कर रहे इन फर्जी कर्मचारियों को अब कैसे पहचाना जाएगा और कब कार्रवाई होगी?
👉 सरकारी कलम मानता है कि इस भर्ती घोटाले की CBI या हाई-लेवल जांच ज़रूरी है, ताकि दोषियों को चिन्हित किया जा सके और जनता के टैक्स का सही इस्तेमाल सुनिश्चित हो सके।
