सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: जमानत याचिका पर 43 बार सुनवाई टालने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की खिंचाई
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की उस कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाया है, जिसमें एक आपराधिक मामले में आरोपी की जमानत याचिका पर 43 बार सुनवाई स्थगित की गई। अदालत ने इसे नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया।
मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने रामनाथ मिश्रा उर्फ रमानाथ मिश्रा को जमानत देते हुए कहा कि यदि वे किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो तुरंत रिहा किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश उस समय दिया जब अभियुक्त साढ़े तीन साल से अधिक समय से सीबीआई के कई मामलों में हिरासत में था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा:
“व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों को इतनी बार टालना न्यायालय की उचित प्रवृत्ति नहीं है। हमने बार-बार टिप्पणी की है कि ऐसे मामलों पर शीघ्रता से निर्णय लिया जाना चाहिए।”
क्यों उठी आलोचना?
- आरोपी की जमानत याचिका पर 43 बार सुनवाई स्थगित की गई।
- लंबी अवधि तक हिरासत में रखने से व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आघात पहुंचा।
- शीर्ष अदालत ने कहा कि निचली अदालतों को ऐसे मामलों में तत्काल और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
अब आगे क्या?
- सुप्रीम कोर्ट ने जमानत मंजूर कर दी है।
- आरोपी को केवल तभी जेल में रखा जाएगा यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित हो।
- यह फैसला अन्य लंबित जमानत मामलों के लिए भी एक कड़ा संदेश है कि अदालतों को बार-बार टालने की प्रवृत्ति छोड़नी चाहिए।
