पेयरिंग स्कूलों में दोहरी जिम्मेदारी का बोझ : शिक्षकों की मुश्किलें बढ़ीं , बालवाटिका में भी होगा पढ़ाना 🚸✍️

पेयरिंग स्कूलों में दोहरी जिम्मेदारी का बोझ : शिक्षकों की मुश्किलें बढ़ीं 🚸✍️

प्रदेश में हाल ही में बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा 10,827 कम संख्या वाले विद्यालयों की पेयरिंग की गई है। इसके तहत जिन स्कूलों को खाली किया गया है, वहां अब बाल वाटिकाएं चलाई जाएंगी। महानिदेशक स्कूल शिक्षा कंचन वर्मा ने इस संबंध में सभी जिलों के बीएसए को निर्देश दिए हैं कि इन बाल वाटिकाओं के संचालन में शिक्षक, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, शिक्षा मित्र व सीईसी एजुकेटर मिलकर काम करेंगे।

निर्देशों के अनुसार :

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  • शुरुआत में शिक्षक बच्चों को पढ़ाने और गाइड करने का कार्य करेंगे।
  • धीरे-धीरे जब सीईसी एजुकेटर सीख जाएंगे, तब शिक्षकों का बोझ कम होगा।
  • एजुकेटर के लिए अलग से ट्रेनिंग भी करवाई जाएगी।

पर शिक्षक क्यों हैं परेशान? 🤔

शिक्षकों का कहना है कि यह व्यवस्था व्यावहारिक नहीं है। उन्हें अपने नए विद्यालय की जिम्मेदारी तो निभानी ही है, लेकिन साथ ही पुराने विद्यालय की बाल वाटिका भी देखनी होगी। इससे उनका कार्यभार दोगुना हो जाएगा।

प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षित स्नातक संघ के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा :
➡️ “जहां पहले से ही प्राथमिक स्कूल परिसर में बाल वाटिकाएं चल रही हैं, वहां शिक्षक आसानी से देख सकते हैं। लेकिन पुराने स्कूल की अलग बाल वाटिका की जिम्मेदारी उठाना काफी मुश्किल है।”


असली सवाल 📝

  • क्या एक शिक्षक दो जगह एक साथ जिम्मेदारी निभा सकता है?
  • क्या बाल वाटिका जैसे नाजुक स्तर पर बच्चों को उचित समय और ध्यान मिल पाएगा?
  • क्या शिक्षा की गुणवत्ता इस प्रयोग से प्रभावित नहीं होगी?

सरकारी कलम की राय 🖋️

सरकार का उद्देश्य निश्चित ही सराहनीय है — छोटे बच्चों के लिए बाल वाटिकाओं को मज़बूत करना और उन्हें प्रारंभिक शिक्षा से जोड़ना। लेकिन इसका समाधान शिक्षकों पर दोहरी जिम्मेदारी डालना नहीं हो सकता

👉 अगर सच में गुणवत्ता सुनिश्चित करनी है तो

  • सीईसी एजुकेटर और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को फुल ट्रेनिंग और संसाधन दिए जाएं।
  • शिक्षकों से केवल समन्वय और गाइडेंस तक का काम लिया जाए, दोहरी जिम्मेदारी नहीं।
  • अलग से बाल वाटिका प्रशिक्षित शिक्षक की व्यवस्था की जाए।

📌 निष्कर्ष :
पेयरिंग व्यवस्था में शिक्षकों पर अतिरिक्त बोझ डालना समाधान नहीं, बल्कि नई समस्या खड़ी करना है। बच्चों की शिक्षा और शिक्षकों की कार्य-क्षमता दोनों तभी सुरक्षित रह पाएंगी, जब जिम्मेदारियों का सही बंटवारा किया जाए।


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