परिषदीय शिक्षकों के समायोजन में गड़बड़ी : नीति से अलग अफसरों का खेल ⚠️✍️
8 अगस्त 2025 को बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा जारी स्थानांतरण व समायोजन सूची अब सवालों के घेरे में है। जिस पारदर्शिता और तार्किकता की बात सरकार ने की थी, वही लापरवाही और गड़बड़ी से ध्वस्त होती दिख रही है।
कहाँ हुई गड़बड़ी? 📝
- मर्जर रद्द होने वाले स्कूलों में भी तबादला
- प्रयागराज के धनुपुर विकासखंड के विद्यालय (बनकट, बैजपुर, जसरा और बबुरी आदि) का विलय रद्द कर दिया गया था।
- बावजूद इसके इन विद्यालयों के शिक्षकों के नाम समायोजन सूची में शामिल कर दिए गए।
- सरप्लस का मनमाना इस्तेमाल
- कई शिक्षक सरप्लस घोषित कर तबादला कर दिए गए, फिर बाद में वही स्थानांतरण रद्द किया गया।
- नतीजा – शिक्षकों को दोहरी परेशानी और स्कूलों में शिक्षक-छात्र अनुपात और बिगड़ गया।
- प्रधानाध्यापकों का गलत समायोजन
- 30 जून की सूची में प्रधानाध्यापकों को उच्च प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक बनाकर भेज दिया गया।
- जबकि 150 छात्रसंख्या से कम वाले स्कूलों में प्रधानाध्यापकों को सरप्लस घोषित करने पर हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच से स्टे चल रहा था।
- विषयवार मैपिंग की अनदेखी
- आरटीई के नियम साफ कहते हैं :
- प्राथमिक स्कूल : 60 छात्रों पर 2 शिक्षक अनिवार्य।
- उच्च प्राथमिक स्कूल : 100 छात्रों पर कम से कम 3 विषयवार शिक्षक (गणित/विज्ञान, भाषा, सामाजिक विषय)।
- लेकिन विभाग ने न तो विषयवार सरप्लस घोषित किए और न ही विषयवार रिक्तियां दिखाई।
- परिणाम – एक स्कूल का अनुपात ठीक किया तो दूसरे स्कूल का बिगड़ गया।
- आरटीई के नियम साफ कहते हैं :
शिक्षकों का आरोप 🎤
शिक्षकों का कहना है कि –
- 23 मई 2025 की स्थानांतरण नीति में स्पष्ट था कि स्वेच्छा से आवेदन करने वाले शिक्षकों का तार्किक परिनियोजन होगा।
- पर जमीनी हकीकत यह है कि अफसरों ने नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए बड़े पैमाने पर मनमाना समायोजन किया।
- कई शिक्षकों को न्यायिक आदेशों की अनदेखी करते हुए गलत तरीके से स्थानांतरित किया गया।
सरकारी कलम की राय 🖋️
शिक्षा विभाग का यह रवैया गंभीर सवाल खड़े करता है :
- जब कोर्ट के आदेश का पालन ही नहीं होना है तो नीतियां बनाने का औचित्य क्या है?
- क्या यह “शिक्षक हितैषी नीति” है या सिर्फ अफसरशाही का खेल?
- बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के बजाय विभाग सिर्फ “संख्या का खेल” खेल रहा है।
👉 शिक्षकों की आवाज़ अनसुनी कर और नियमों की अवहेलना कर, सरकार न सिर्फ अदालत की अवमानना कर रही है बल्कि बच्चों के शिक्षा के अधिकार (RTE) का भी उल्लंघन कर रही है।
📌 निष्कर्ष :
स्थानांतरण और समायोजन की यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं बल्कि अव्यवस्थित साबित हो रही है। शिक्षकों को इधर-उधर भटकाने से न तो शिक्षा स्तर सुधरेगा और न ही स्कूलों में स्थिरता आएगी। ज़रूरत है कि सरकार तत्काल इस गड़बड़ी को सुधारे और शिक्षक-हितैषी पारदर्शी नीति लागू करे।
