⚡️ ऊर्जा संगठनों का आरक्षण बचाओ मोर्चा — 16 हज़ार आरक्षित पदों की सुरक्षा की लड़ाई!
पूर्वांचल-दक्षिणांचल बिजली निगमों के निजीकरण के विरोध में तेज़ हुआ आंदोलन
🔎 मामला क्या है?
उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के प्रस्तावित निजीकरण से
लगभग 16 हज़ार आरक्षित पदों के समाप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। यही कारण है कि
बिजली कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति एवं संबंधित ऊर्जा संगठनों ने
आरक्षण को बचाने के लिए मोर्चा खोल दिया है।
🗓️ 15 जुलाई, आगरा में आरक्षण बचाओ सम्मेलन
आंदोलन की अगली कड़ी के रूप में आगरा में 15 जुलाई को
“आरक्षण बचाओ सम्मेलन” आयोजित होगा, जहाँ योजना-कार्रवाई की नई रणनीति तय की जाएगी।
इससे पहले कानपुर और वाराणसी में भी सफल बैठकें हो चुकी हैं।
🌾 किसान और उपभोक्ता भी आंदोलन से जुड़ेंगे
बैठक में निर्णय लिया गया कि निजीकरण के विरोध में किसानों व बिजली उपभोक्ताओं को भी जोड़ा जाएगा।
इससे आंदोलन का दायरा व्यापक होगा और सरकार पर दबाव बढ़ेगा।
🎤 सार्वजनिक सुनवाई में खुलेगी निजीकरण की पोल
15–17 जुलाई को विद्युत नियामक आयोग के सामने बिजली दर निर्धारण पर
सार्वजनिक सुनवाई है। संगठन इन सुनवाइयों में निजीकरण की कमज़ोरियों और ख़ामियों को उजागर करेगा
तथा आरक्षित वर्ग के रोज़गार पर मंडराते खतरे को जनता के सामने रखेगा।
📍 20 जुलाई: लखनऊ में AEPUF की अहम बैठक
प्रदेश-स्तर पर आंदोलन को गति देने के लिए AEPUF (ऑल इंडिया इलेक्ट्रिसिटी पावर यूनाइटेड फोरम) की
बैठक 20 जुलाई को लखनऊ में होगी, जहाँ राज्यव्यापी कार्ययोजना पर मुहर लगाई जाएगी।
🗣️ नेतृत्व ने क्या कहा?
अखिलेश कुमार वर्मा (पावर ऑफिसर्स एसोसिएशन अध्यक्ष) का कहना है कि
“यदि सरकार निजीकरण के निर्णय को वापस नहीं लेती तो आरक्षित पदों के बचाव के लिए
ग़ैर-मुक्त आंदोलन छेड़ा जाएगा।”
🚦 निष्कर्ष — आरक्षण बनाम निजीकरण
प्रस्तावित निजीकरण ने जहां बिजली क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा की बहस को जन्म दिया है,
वहीं इससे आरक्षित समुदायों के लिए सुरक्षित नौकरियों पर संकट आ खड़ा हुआ है।
ऊर्जा संगठनों का यह मोर्चा सिर्फ़ कर्मचारियों का नहीं, बल्कि
सामाजिक न्याय और रोज़गार की सुरक्षा की लड़ाई बन चुका है।
आने वाले दिनों में यह संघर्ष किस करवट बैठेगा, इस पर पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी हैं।
