सरकार खुद स्कूल मर्जर का आदेश दे रही है, उसी की तरफ से “प्रॉक्सी” याचिका दाखिल कर यह जताने की कोशिश की जा रही है कि “हम बच्चों की चिंता कर रहे हैं”।”गंगाधर ही शक्तिमान है”


✍️ “गंगाधर ही शक्तिमान है”

सरकार ही आदेश दे रही, सरकार ही जनहित याचिका दाखिल कर रही!

प्रदेश सरकार द्वारा जारी किए गए 16 जून 2025 के स्कूल मर्जर आदेश के खिलाफ जिस जनहित याचिका (PIL) को एक “न्यायिक हस्तक्षेप” की तरह प्रचारित किया जा रहा है, असल में वह खुद सरकार का ही एक प्रॉक्सी स्टंट साबित होता दिख रहा है।

👉 याचिका में यह मांग की गई है कि मर्जर लागू करने से पहले ग्रामीण, वंचित और कमजोर वर्गों के बच्चों के लिए परिवहन सुविधा उपलब्ध कराई जाए।

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इसका सीधा मतलब यह है कि:

सरकार खुद बच्चों को दूर स्कूल भेजने का आदेश देती है, फिर कोर्ट में जाकर खुद कहती है – “इन बच्चों के लिए ट्रांसपोर्ट तो दीजिए।”

यह दोहरा खेल नहीं तो और क्या?

  • मर्जर आदेश कौन लाया? सरकार
  • ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था किसे करनी थी? सरकार
  • अब कोर्ट से ट्रांसपोर्ट की मांग कौन कर रहा है? फिर सरकार (या उसके इशारे पर कोई “हितैषी”)

क्या इसे हम “पूर्व नियोजित लीगल वैलिडेशन ड्रामा” कहें?


🤔 क्या यह सब दिखावा है?

इस तरह की याचिका का एक ही मकसद हो सकता है —
सरकारी आदेश को “जनहित” का चोला पहनाना ताकि भविष्य में कोई असली जनहित याचिका (जैसे छात्रों की, शिक्षकों की, या समाजसेवियों की ओर से) आए तो सरकार कह सके – “देखिए, हमने तो खुद कोर्ट से बच्चों के हित की बात की थी!”


🚨 असली सवाल यह है:

  • क्या मर्जर से पहले ट्रांसपोर्ट की सुविधा वास्तव में दी जाएगी?
  • क्या सरकार NEP और RTE की असली भावना को समझती है या उसे केवल लॉजिकल कवर अप के रूप में इस्तेमाल कर रही है?
  • और क्या शिक्षक व ग्रामीण अभिभावक इन दिखावों को समझ पाएंगे?

निष्कर्ष:

शिक्षा का प्रश्न नाटक का विषय नहीं है।
यदि सरकार वाकई संवेदनशील होती, तो पहले सुविधा देती – फिर मर्जर करती।

लेकिन फिलहाल जो हो रहा है, वह यही कहता है:

🌀 “आदेश भी खुद का, याचिका भी खुद की, और फिर कहेंगे – देखिए, हम कितने संवेदनशील हैं!”

👉 सच तो ये है – गंगाधर ही शक्तिमान है।


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