🖋️ क्या शिक्षक ही हमेशा कटघरे में खड़े किए जाएंगे?
दैनिक जागरण की रिपोर्ट पर एक आलोचनात्मक प्रतिक्रिया
📚✍️ — विश्लेषणात्मक लेख
🛑 “बच्चों के बिना स्कूल में बैठकर ड्यूटी निभा रहे हैं मास्साब” — क्या यह सच है या झूठ का सुनियोजित शोर?
दैनिक जागरण द्वारा प्रकाशित समाचार “काश! सबको मिल जाए ऐसी नौकरी” एक बेहद पूर्वग्रह से ग्रसित, गैर-जिम्मेदाराना और शिक्षकों के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने वाली रिपोर्ट है। यह समाचार न केवल आधा सच दिखाता है, बल्कि उसे भी तोड़-मरोड़कर पेश करता है।

🎯 1. बिना आदेश के शिक्षक कहाँ जाएं?
रिपोर्ट में कहा गया है कि बच्चों की “पेयरिंग” तो हो गई, लेकिन शिक्षकों की नहीं। सवाल यह उठता है — क्या शिक्षक स्वयं ट्रांसफर कर सकते हैं?
उत्तर है: नहीं।
शिक्षक विभागीय आदेशों और पोर्टल पर बदलाव के बिना किसी अन्य स्कूल में कार्यभार ग्रहण नहीं कर सकते। उन्हें अपनी तैनाती के अनुसार ही उपस्थित रहना होता है, वरना उन पर गैरहाजिरी का आरोप लगेगा।
🛠️ 2. मानव संपदा पोर्टल की विफलता पर शिक्षक क्यों बलि का बकरा बनें?
रिपोर्ट यह भी बताती है कि “यू-डायस नंबर” और मानव संपदा पोर्टल पर मर्ज की प्रक्रिया नहीं हुई। तो क्या यह काम शिक्षकों का था?
नहीं, यह जिम्मेदारी बेसिक शिक्षा विभाग, बीएसए कार्यालय और तकनीकी टीम की है।
तो दोष किसका है? शिक्षक का या सिस्टम का?
💰 3. वेतन किस आधार पर?
पत्रकार साहब यह सवाल उठाते हैं — “जब स्कूल में बच्चे नहीं हैं, तो वेतन क्यों मिल रहा है?”
तो एक पल रुकिए!
जब कोर्ट और शासन यह कह रहा है कि स्कूल बंद नहीं हुए, सिर्फ पेयर हुए हैं, तो स्कूल, शिक्षक और पद सभी जीवित हैं, और जब तक विभागीय आदेश नहीं आता, तब तक वेतन रोकना अवैधानिक होगा।
🎓 4. क्या शिक्षक सिर्फ ड्यूटी पर बैठते हैं?
रिपोर्ट में कहा गया है कि शिक्षक खाली बैठकर ड्यूटी कर रहे हैं।
क्या आपने कभी जाकर देखा है कि ये शिक्षक डाटा अपडेटिंग, दस्तावेज़ी कार्य, समग्र शिक्षा मिशन की रिपोर्टिंग, पोर्टल कार्य, बच्चों के माता-पिता से संपर्क, भवन सुरक्षा कार्यों की निगरानी आदि करते हैं?
शिक्षक “बच्चों के न होने पर भी सिस्टम के गियर” की तरह काम कर रहे हैं, लेकिन उनकी मेहनत को “बैठकर सैलरी खाने वाला” कह देना बेहद दुर्भावनापूर्ण है।
📢 5. क्या डेढ़ लाख के शिक्षक को आंगनबाड़ी जैसी भूमिका में समेटना न्याय है?
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि “जिस कार्य को शिक्षा मित्र या आंगनबाड़ी कर सकती है, वही कार्य एक डेढ़ लाख वेतन वाले शिक्षक से क्यों?”तो बताते चले 80% शिक्षक लगभग 70 हजार प्रतिमाह से नीचे वेतन पर कार्यरत है बाकी 20% ही इस जादुई आंकड़े के आस पास है ,
तो फिर आप B.Ed, CTET, TET जैसी परीक्षाएं क्यूं कराते हैं?
क्या NEP 2020 के अंतर्गत ECCE जैसी नीति को लागू करने के लिए सिर्फ बाल संगिनी ही काफी हैं?
क्या प्री-प्राइमरी शिक्षा को प्रोफेशनलाइज नहीं किया जाना चाहिए?
✅ गौर करने योग्य बात ये है ,यह प्रदेश की इकलौती ऐसी नौकरी है ,जिसमें चिकित्सा भत्ता 0 रुपए EL प्रतिवर्ष मात्र एक (अन्य को 30 या उससे अधिक ) जैसी दोहरे मापदंडों पर कार्य करना पड़ता है ,।।
🧭 तो आखिर पत्रकार का उद्देश्य क्या था?
- शिक्षक को आलसी और फ्रीखोर बताना?
- सरकारी नौकरी को बदनाम करना?
- सिस्टम की खामियों को नीचे स्तर के कर्मचारियों पर थोपना?
क्या कभी किसी ने यह पूछा कि विभाग ने टाइमबाउंड पोर्टल अपडेटिंग क्यों नहीं की?
क्या कभी बीएसए से यह सवाल किया गया कि “शिक्षक पेयरिंग के बाद किस निर्देश का पालन करें?”
✊ शिक्षक: दोष नहीं, व्यवस्था का आधार हैं
शिक्षक समाज के वह स्तंभ हैं जो आज भी असमंजस में डगमगाते आदेशों के बीच डटे हैं। वे न नीति बना सकते हैं, न ट्रांसफर आदेश।
उनका कर्तव्य है पालन करना — और वे वही कर रहे हैं।
इसलिए उन्हें कठघरे में नहीं, सम्मान के मंच पर खड़ा किया जाना चाहिए।
✍️ निष्कर्ष:
“जिनके कंधों पर देश का भविष्य है, उन्हें नीचा दिखाकर हम अपने कल को ही कमजोर कर रहे हैं।”
पत्रकारिता का धर्म होता है सत्य दिखाना, सनसनी नहीं।
यह लेख दैनिक जागरण की रिपोर्ट को एकपक्षीय, शिक्षकों की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला और प्रणाली की विफलताओं पर पर्दा डालने वाला कृत्य सिद्ध करता है।
