⚖️ देश का पहला निष्क्रिय इच्छामृत्यु मामला: 13 साल से कोमा में रहे हरीश राणा का निधन
📢 भारत में पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) का एक ऐतिहासिक मामला सामने आया है, जिसने कानून, चिकित्सा और मानवीय संवेदनाओं—तीनों को एक साथ झकझोर दिया है।
👉 गाजियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा ने
🕯️ मंगलवार शाम 4:10 बजे एम्स में अंतिम सांस ली,
जब उनके जीवन रक्षक उपकरण पूरी तरह बंद किए जाने के 8 दिन पूरे हो चुके थे।
🏥 क्या था पूरा मामला?
📌 हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से कोमा में थे
👉 13 साल पहले
🎓 चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान
🏢 हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के कारण
उन्हें गंभीर चोट लगी थी
⚠️ इसके बाद से वह कभी होश में नहीं आ सके।
👨👩👦 माता-पिता का संघर्ष
💔 हरीश के माता-पिता ने 13 साल तक उनकी सेवा की
✔️ कृत्रिम पोषण (फीडिंग ट्यूब) के जरिए खाना-पानी दिया जाता था
✔️ लगातार इलाज और देखभाल जारी रही
👉 लेकिन डॉक्टरों के अनुसार:
❌ उनके ठीक होने की कोई संभावना नहीं थी
⚖️ सुप्रीम कोर्ट की अनुमति
📢 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी
👉 यह फैसला:
✔️ माता-पिता की सहमति
✔️ मेडिकल बोर्ड की सलाह
के आधार पर लिया गया।
🏥 एम्स में क्या हुआ?
📍 हरीश को एम्स के पैलिएटिव केयर वार्ड में भर्ती किया गया
👩⚕️ डॉक्टरों की एक विशेष टीम बनाई गई,
जिसका नेतृत्व डॉ. सीमा मिश्रा ने किया
प्रक्रिया इस प्रकार रही:
1️⃣ पहले भोजन बंद किया गया
2️⃣ फिर पानी बंद किया गया
3️⃣ 17 मार्च को फीडिंग ट्यूब पूरी तरह हटा दी गई
👉 धीरे-धीरे शरीर के अंगों ने काम करना बंद कर दिया
👉 और अंततः उनका निधन हो गया
❤️ मृत्यु के बाद भी जीवनदान
🙏 हरीश राणा के परिवार ने एक महान निर्णय लिया:
✔️ आंखों के कॉर्निया दान किए गए
✔️ हृदय के वाल्व भी दान किए गए
👉 इससे कई लोगों को नई जिंदगी मिल सकेगी।
⚖️ क्या है निष्क्रिय इच्छामृत्यु?
📘 निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) का मतलब:
👉 मरीज के जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले
उपकरण/सपोर्ट को हटाना
⚠️ यह केवल सख्त कानूनी और मेडिकल प्रक्रिया के तहत ही संभव है।
🤔 क्यों है यह मामला ऐतिहासिक?
🔴 भारत का पहला ऐसा केस
जहां कोर्ट की अनुमति से
👉 जीवन रक्षक प्रणाली हटाई गई
👉 यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए
कानूनी मिसाल (precedent) बन सकता है।
📝 निष्कर्ष
💡 हरीश राणा का मामला सिर्फ एक मेडिकल केस नहीं,
बल्कि मानवीय पीड़ा, परिवार के संघर्ष और कानूनी संवेदनशीलता की कहानी है।
🙏 एक तरफ 13 साल का संघर्ष,
और दूसरी तरफ मृत्यु के बाद भी
👉 अंगदान के जरिए जीवन देने का महान निर्णय
✍️ सरकारी कलम के लिए विशेष भावनात्मक और विश्लेषणात्मक रिपोर्ट
📲 ऐसी ही महत्वपूर्ण खबरों के लिए जुड़े रहें!
