⚖️ सिर्फ WhatsApp चैट के आधार पर नहीं मिल सकता तलाक, बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
डिजिटल दौर में वैवाहिक विवादों में अक्सर व्हाट्सएप और एसएमएस जैसे संदेशों को सबूत के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन इस पर एक अहम फैसला सुनाते हुए Bombay High Court ने स्पष्ट किया है कि केवल व्हाट्सएप चैट या एसएमएस के आधार पर किसी शादी को खत्म करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जब तक कि इन इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को कानूनी प्रक्रिया के तहत प्रमाणित न किया गया हो।
हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए निचली अदालत के एकतरफा तलाक के आदेश को रद्द कर दिया और मामले को दोबारा सुनवाई के लिए भेज दिया।
👩⚖️ खंडपीठ ने दिया महत्वपूर्ण आदेश
यह फैसला जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने सुनाया।
अदालत ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को उचित गवाही और कानूनी प्रक्रिया के जरिए प्रमाणित किया जाना जरूरी है। महज व्हाट्सएप चैट के भरोसे तलाक देना उचित नहीं है।
📑 क्या था पूरा मामला
मामला नासिक का है। यहां पति ने हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13(1)(i-a) के तहत क्रूरता को आधार बनाकर तलाक की अर्जी दाखिल की थी।
पति का आरोप था कि उसकी पत्नी उसे पुणे शिफ्ट होने के लिए मजबूर कर रही थी। जब उसने ऐसा करने से इनकार किया तो पत्नी ने उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।
सबूत के तौर पर पति ने अदालत में कुछ व्हाट्सएप मैसेज पेश किए थे, जिनमें कथित तौर पर पत्नी ने उसकी मां और बहन के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया था।
🏛️ फैमिली कोर्ट ने दिया था एकतरफा तलाक
नासिक फैमिली कोर्ट ने 27 मई 2025 को पत्नी की अनुपस्थिति में पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए तलाक मंजूर कर लिया था।
निचली अदालत ने माना था कि पति के आरोपों की पुष्टि व्हाट्सएप और एसएमएस चैट से होती है, जिनमें पत्नी द्वारा भावनात्मक दबाव और अभद्र भाषा का इस्तेमाल दिखाई देता है।
❗ हाईकोर्ट ने जताई कड़ी आपत्ति
जब पत्नी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी तो अदालत ने रिकॉर्ड की बारीकी से जांच की।
हाईकोर्ट ने पाया कि यह फैसला पूरी तरह एकतरफा था और पत्नी को गंभीर आरोपों का जवाब देने का मौका ही नहीं दिया गया।
अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को क्रूरता का दोषी ठहराने से पहले उसे अपनी सफाई देने और गवाहों से जिरह करने का पूरा अधिकार है।
🤝 अदालत ने दी मध्यस्थता की सलाह
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेज दिया है।
अब निचली अदालत इस मामले की नए सिरे से सुनवाई करेगी, जिसमें पत्नी को भी अपने साक्ष्य पेश करने की पूरी स्वतंत्रता दी जाएगी।
साथ ही खंडपीठ ने दोनों पक्षों को सुझाव दिया कि वे चाहें तो लंबी कानूनी लड़ाई के बजाय मध्यस्थता के जरिए आपसी समझौते का रास्ता भी तलाश सकते हैं।
✍️ सरकारी कलम की नजर
यह फैसला डिजिटल युग में एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि अदालतों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की भी कानूनी प्रमाणिकता जरूरी है। केवल व्हाट्सएप चैट या मैसेज के आधार पर किसी की वैवाहिक जिंदगी को खत्म करने का फैसला नहीं लिया जा सकता।
