⚖️ आबकारी नीति मामला: केजरीवाल, सिसोदिया समेत 23 आरोपी बरी, सीबीआई हाईकोर्ट पहुंची

⚖️ आबकारी नीति मामला: केजरीवाल, सिसोदिया समेत 23 आरोपी बरी, सीबीआई हाईकोर्ट पहुंची

राउज एवेन्यू कोर्ट की विशेष अदालत ने राजनीतिक रूप से संवेदनशील आबकारी नीति मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, के कविता सहित 23 आरोपियों को बरी कर दिया।

598 पन्नों के विस्तृत आदेश में विशेष जज जितेंद्र सिंह ने कहा कि “गंभीर संदेह तो दूर, प्रथमदृष्टया मामला भी नहीं बनता।”


🔎 अदालत की कड़ी टिप्पणी

कोर्ट ने जांच एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को फटकार लगाते हुए कहा कि—

  • मामला न्यायिक जांच में पूरी तरह विफल और निराधार साबित हुआ।
  • जांच पूर्वनिर्धारित दिशा में आगे बढ़ी।
  • नीति निर्माण या कार्यान्वयन से जुड़े लगभग हर व्यक्ति को आरोपित किया गया, ताकि कमजोर कहानी को विश्वसनीयता का भ्रम दिया जा सके।

अदालत ने जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के आदेश भी दिए।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अनुमान और धारणाओं के बजाय ठोस व कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्यों के आधार पर ही अभियोजन दायर होना चाहिए।

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📜 क्या था मामला?

सीबीआई ने अगस्त 2022 में मामला दर्ज किया था। एजेंसी का दावा था कि आबकारी नीति के निर्माण चरण में ही आपराधिक साजिश रची गई और निविदा प्रक्रिया में खामियां डालकर चुनिंदा संस्थाओं को लाभ पहुंचाया गया।

यह शिकायत उपराज्यपाल वीके सक्सेना की ओर से की गई थी।


⚡ सीबीआई पहुंची हाईकोर्ट

फैसले के तुरंत बाद सीबीआई ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर विशेष अदालत के आदेश को निरस्त करने की मांग की।

सीबीआई का कहना है कि ट्रायल कोर्ट ने जांच के कई पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया।


🗣️ केजरीवाल का बयान

आरोपमुक्त होने के बाद अरविंद केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली में उनकी सरकार गिराने के लिए राजनीतिक साजिश रची गई। उन्होंने दावा किया कि “शराब घोटाला आज़ाद भारत का सबसे बड़ा राजनीतिक षड्यंत्र था।”

उन्होंने भाजपा को चुनौती देते हुए कहा कि यदि अभी चुनाव हों तो जनता फिर आम आदमी पार्टी पर भरोसा जताएगी।


📌 फैसले का महत्व

👉 अदालत ने कहा कि मामला आपराधिक अभियोजन की बुनियादी शर्तें पूरी नहीं करता।
👉 सभी 23 आरोपियों को आरोपमुक्त किया गया।
👉 जांच एजेंसियों की निष्पक्षता और साक्ष्य-आधारित कार्रवाई पर जोर दिया गया।


✍️ सरकारी कलम की राय

यह फैसला देश की न्यायिक प्रक्रिया और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर व्यापक चर्चा का विषय बन गया है।

  • न्यायपालिका ने स्पष्ट संदेश दिया है कि ठोस साक्ष्य के बिना अभियोजन स्वीकार्य नहीं।
  • जांच एजेंसियों को पारदर्शिता और निष्पक्षता के उच्च मानकों का पालन करना चाहिए।
  • राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में न्यायिक संतुलन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

अब सबकी निगाहें दिल्ली हाईकोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं।

सरकारी कलम देश की न्यायिक और राजनीतिक घटनाओं पर निष्पक्ष जानकारी आप तक पहुंचाता रहेगा। 📰✨

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