⚖️ सोशल मीडिया पर न्यायपालिका के खिलाफ गाली-गलौज बर्दाश्त नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त चेतावनी
Allahabad High Court ने सोशल मीडिया पर न्यायपालिका के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियों को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि फैसलों की निष्पक्ष आलोचना और ऑनलाइन गाली-गलौज में फर्क है — और बाद वाला सीधे आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) के दायरे में आ सकता है।
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने चेतावनी दी:
“यदि अदालत ऐसे पोस्ट पर अवमानना क्षेत्राधिकार में संज्ञान लेती है, तो इसके गंभीर कानूनी नतीजे होंगे। सख्त सजा देने में हिचकिचाया नहीं जाएगा।”
कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में न्यायपालिका के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रसार चिंताजनक है और आलोचना के दायरे से बाहर है।
📌 मामला क्या था?
यह टिप्पणी बस्ती जिला अदालत में वकील हरि नारायण पांडे के खिलाफ चल रही अवमानना कार्यवाही से जुड़े मामले में आई। हालांकि आरोपी वकील ने बिना शर्त माफी मांग ली थी, लेकिन कोर्ट ने व्यापक संदर्भ में सोशल मीडिया पर बढ़ते आपराधिक अवमानना के मामलों पर चिंता जताई।
हाईकोर्ट की ओर से पेश वकील ने भी कहा कि “क्रिमिनल कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट” अब रोजमर्रा की बात बनती जा रही है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फिलहाल वह इस मुद्दे पर न्यायिक नोटिस नहीं ले रही है, लेकिन स्थिति पर नजर रखे हुए है।
🏛️ “सम्मेलनों से नहीं सुधरेगी न्याय व्यवस्था”
इसी क्रम में हाईकोर्ट की एक अन्य महत्वपूर्ण टिप्पणी भी सामने आई।
पत्नी और तीन बच्चों की हत्या के आरोप में लगभग 23 वर्ष जेल में रहने के बाद साक्ष्यों के अभाव में एक व्यक्ति को बरी करते हुए कोर्ट ने आपराधिक न्याय प्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने कहा:
“केवल सम्मेलन और बैठकों से स्थिति नहीं सुधरेगी। जजों की संख्या, सहायक स्टाफ और आधारभूत ढांचे में वास्तविक वृद्धि जरूरी है।”
कोर्ट ने इसे न्याय वितरण प्रणाली के लिए “दुखद मामला” बताते हुए ठोस सुधारात्मक कदमों की आवश्यकता बताई।
⏳ “बेवजह टालमटोल न्याय के लिए खतरनाक”
एक अन्य मामले में न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह ने चेक बाउंस प्रकरण में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए कहा:
- न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक देरी जनता का भरोसा कमजोर करती है।
- “देरी के खतरनाक नतीजे होते हैं” — विलियम शेक्सपियर के शब्दों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि लंबी कानूनी कार्रवाई “Justice delayed is justice denied” की कहावत को चरितार्थ करती है।
- यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई के अधिकार के विपरीत है।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि मामला त्वरित गति से निपटाया जाए, जब तक किसी उच्च अदालत से रोक न हो।
✍️ सरकारी कलम की टिप्पणी
इलाहाबाद हाईकोर्ट की ये तीनों टिप्पणियां न्याय व्यवस्था की गंभीर चुनौतियों को सामने लाती हैं:
📌 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम न्यायपालिका की गरिमा
📌 न्यायिक ढांचे में संसाधनों की कमी
📌 मामलों के निस्तारण में अनावश्यक देरी
न्यायपालिका लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ है। उसकी आलोचना हो सकती है, लेकिन गरिमा की मर्यादा में। साथ ही, न्याय व्यवस्था को मजबूत करने के लिए संरचनात्मक सुधार समय की मांग है।
सरकारी कलम न्याय से जुड़े हर महत्वपूर्ण घटनाक्रम पर आपकी नजर बनाए रखेगा। ⚖️📰
