⚡ नई बिजली दरों की प्रक्रिया शुरू, एआरआर पर सुनवाई में उठे तीखे सवाल
लखनऊ। प्रदेश में नई बिजली दरें तय करने की प्रक्रिया बुधवार से औपचारिक रूप से शुरू हो गई। Uttar Pradesh State Load Dispatch Centre (यूपीएसएलडीसी) के वार्षिक राजस्व आवश्यकता प्रस्ताव (ARR) पर सुनवाई के साथ यह प्रक्रिया आगे बढ़ी। सुनवाई Uttar Pradesh Electricity Regulatory Commission के सभागार में अध्यक्ष अरविंद कुमार और सदस्य संजय कुमार सिंह की मौजूदगी में हुई।
🔎 सुनवाई में क्या-क्या मुद्दे उठे?
1️⃣ याचिका सार्वजनिक न करने पर आपत्ति
सुनवाई शुरू होते ही यह सवाल उठा कि ऐन पहले तक याचिका सार्वजनिक क्यों नहीं की गई। पारदर्शिता को लेकर आपत्ति दर्ज कराई गई।
2️⃣ कम मांग बताकर उत्पादन इकाइयां बंद?
राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि कम बिजली मांग का हवाला देकर उत्पादन इकाइयों को बंद करना अनुचित है।
उनका तर्क था कि प्रदेश में लागू रोस्टर व्यवस्था के कारण मांग कम दिखाई दे रही है।
“यदि ग्रामीण क्षेत्रों को 18 घंटे से भी कम बिजली दी जाए तो मांग और कम दिखेगी—यह तर्कसंगत नहीं है।”
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के कंज्यूमर राइट्स रूल-2020 के तहत शहरी और ग्रामीण उपभोक्ताओं को 24 घंटे बिजली का अधिकार है, लेकिन प्रावधानों को आधा-अधूरा लागू किया जा रहा है।
📊 एआरआर के आंकड़ों पर भी सवाल
यूपीएसएलडीसी ने वर्ष 2026-27 के लिए एआरआर ₹51 करोड़ 50 लाख दर्शाया है।
इसमें वर्ष 2024-25 के पहले से अनुमोदित ₹23 करोड़ 81 लाख भी जोड़े गए हैं।
उपभोक्ता परिषद का दावा है कि:
👉 वास्तविक एआरआर लगभग ₹27 करोड़ होना चाहिए।
इस पर नियामक आयोग के अध्यक्ष अरविंद कुमार ने टिप्पणी की:
“पहली बार किसी याचिका में इतनी खामियां सामने आई हैं। यह गंभीर मामला है, यूपीएसएलडीसी इसे सही करे।”
🏢 कौन-कौन रहे मौजूद?
सुनवाई में ट्रांसमिशन और यूपीएसएलडीसी के प्रबंध निदेशक मयूर माहेश्वरी सहित सभी संबंधित एमडी उपस्थित रहे और उन्होंने अपने पक्ष में प्रस्तुतीकरण दिया।
⚖️ आगे क्या?
नई बिजली दरों का निर्धारण अब सुनवाई और आपत्तियों के आधार पर होगा।
- यदि एआरआर में संशोधन होता है तो उसका सीधा असर टैरिफ निर्धारण पर पड़ेगा।
- उपभोक्ताओं की आपत्तियों और आयोग के निर्देशों के बाद अंतिम दरें अधिसूचित की जाएंगी।
📝 सरकारी कलम की टिप्पणी
बिजली दरों का निर्धारण केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों और पारदर्शिता का भी प्रश्न है।
यदि रोस्टर व्यवस्था के कारण मांग कम दिख रही है, तो यह नीति-स्तर पर पुनर्विचार का विषय है।
प्रदेश के करोड़ों उपभोक्ताओं की नजर अब इस बात पर है कि नई दरें राहत देंगी या बोझ बढ़ाएंगी।
✍️ लेख: सरकारी कलम टीम
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