⚖️ विशेष परिस्थितियों में सरकार को आदेश देने की शक्ति: हाईकोर्ट ने अनाथ बच्ची के मामले में दिया मानवीय दृष्टिकोण अपनाने का निर्देश
प्रयागराज से एक अहम और संवेदनशील फैसला सामने आया है। Allahabad High Court ने कहा है कि मृतक आश्रित भर्ती नियमावली-1974 का उद्देश्य सरकारी कर्मचारी के परिवार को दरिद्रता और संकट से बचाना है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि नियमों की ऐसी संकीर्ण व्याख्या नहीं की जानी चाहिए, जिससे वास्तविक रूप से पीड़ित और निराश्रित परिवार लाभ से वंचित रह जाए।
👨🏫 क्या है पूरा मामला?
बलिया के जोगीडील प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक शैलेंद्र कुमार भारती की 7 जून 2018 को सड़क दुर्घटना में ड्यूटी के दौरान मृत्यु हो गई थी।
इसके कुछ ही समय बाद, जुलाई 2018 में उनकी पत्नी का भी निधन हो गया। उस समय उनकी बेटी महज ढाई वर्ष की थी। माता-पिता दोनों के चले जाने के बाद बच्ची पूरी तरह अनाथ हो गई।
👩👧 चाची बनीं विधिक संरक्षक
3 मार्च 2021 को बलिया के अपर जिला जज ने बच्ची की चाची राजकुमारी को उसका विधिक संरक्षक नियुक्त किया। इसके बाद उन्होंने मृतक आश्रित के रूप में दया नियुक्ति का आवेदन किया।
लेकिन बलिया के बेसिक शिक्षा अधिकारी ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि वह 1974 की नियमावली में परिभाषित “परिवार” की श्रेणी में नहीं आतीं।
मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां एकल पीठ ने याचिका खारिज कर दी। इसके बाद याची ने खंडपीठ में अपील की।
🏛️ हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने कहा:
🔹 नियमों का उद्देश्य पीड़ित परिवार को राहत देना है।
🔹 राज्य सरकार के पास नियम 10 के तहत विशेष परिस्थितियों और लोकहित में आदेश पारित करने की शक्ति है।
🔹 बच्ची मात्र 9 वर्ष की है और उसके पास चाचा-चाची के अलावा कोई सहारा नहीं है।
अदालत ने राज्य सरकार को मानवीय दृष्टिकोण अपनाने का निर्देश दिया है और अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता को एक सप्ताह के भीतर लिखित निर्देश लेकर मेरिट के आधार पर उचित आदेश पारित कराने को कहा है।
अगली सुनवाई 27 फरवरी को निर्धारित की गई है।
📜 क्या कहती है मृतक आश्रित नियमावली-1974?
इस नियमावली का मूल उद्देश्य है:
✔️ सेवा के दौरान मृत कर्मचारी के परिवार को आर्थिक संकट से बचाना
✔️ आश्रित सदस्य को सरकारी सेवा में अवसर देकर परिवार की आजीविका सुनिश्चित करना
हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि नियमों की व्याख्या तकनीकी आधार पर नहीं, बल्कि न्याय और संवेदनशीलता के साथ की जानी चाहिए।
🖋️ सरकारी कलम की टिप्पणी
यह मामला केवल एक नियुक्ति का नहीं, बल्कि एक अनाथ बच्ची के भविष्य का है। यदि सरकार विशेष परिस्थितियों में अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करती है, तो यह न केवल न्यायसंगत होगा बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता का भी परिचायक होगा।
👉 दया नियुक्ति का उद्देश्य नियमों की कठोरता नहीं, बल्कि मानवीय राहत है।
अब सबकी नजर राज्य सरकार के निर्णय पर है, जो इस बच्ची के भविष्य की दिशा तय करेगा।
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