⚖️ बुलडोजर कार्रवाई पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणीक्या सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना कर रही है?”


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⚖️ बुलडोजर कार्रवाई पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

“क्या सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना कर रही है?”

उत्तर प्रदेश में बुलडोजर कार्रवाई को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर कड़ी नाराज़गी जताई है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने राज्य सरकार से बेहद गंभीर सवाल पूछते हुए कहा कि—

क्या 2025 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने के बावजूद ध्वस्तीकरण की कार्रवाई जारी रखना अदालत की अवहेलना नहीं है? 🤔

यह टिप्पणी हमीरपुर निवासी फैमुद्दीन और दो अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई।


🏠 क्या है पूरा मामला?

याचिकाकर्ता फैमुद्दीन के परिवार के सदस्य आफान खान के खिलाफ
📅 16 जनवरी 2026 को
📌 सुमेरपुर थाना, हमीरपुर में
आईटी एक्ट, पॉक्सो एक्ट और धर्मांतरण निरोधक कानून के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।

याचिका में आरोप लगाया गया कि—

  • घटना के बाद भीड़ ने फैमुद्दीन के घर को निशाना बनाया
  • जबकि फैमुद्दीन और उनके परिवार के अन्य सदस्य इस मामले में आरोपी नहीं हैं
  • इसके बावजूद
    • घर,
    • लॉज
    • और मिल को सील कर दिया गया
  • नोटिस भी जारी कर दिए गए

याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई कि उनकी संपत्तियों को बुलडोजर से गिराया जा सकता है, इसलिए उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

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❓ हाईकोर्ट के बेहद अहम सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान सरकार से चार बड़े संवैधानिक सवाल पूछे—

🔹 1. क्या सुप्रीम कोर्ट के 2025 के आदेशों का पालन हो रहा है?

🔹 2. क्या अपराध के तुरंत बाद ध्वस्तीकरण करना सरकारी विवेक का दुरुपयोग नहीं है?

🔹 3. क्या सार्वजनिक आवश्यकता के बिना किसी का घर गिराना राज्य का अधिकार है?

🔹 4. अगर ध्वस्तीकरण की आशंका हो तो क्या नागरिक अदालत नहीं जा सकता?

कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिए कि कानून से ऊपर कोई नहीं है, न ही सरकार।


⚠️ कोर्ट की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि—

“अदालत ऐसे कई मामलों की साक्षी रही है, जहां किसी अपराध के तुरंत बाद संपत्तियों को निशाना बनाकर औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं और फिर ध्वस्तीकरण कर दिया जाता है।”

कोर्ट ने यह भी पूछा कि—

क्या यह शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) का उल्लंघन नहीं है?
क्योंकि सजा देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है, न कि कार्यपालिका के पास।

यह टिप्पणी सीधे-सीधे बुलडोजर न्याय पर सवाल खड़े करती है। 🚜❌


🏛️ राज्य सरकार का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने दलील दी कि—

  • याचिका अभी अपरिपक्व (Premature) है
  • आवास और लॉज को अभी ध्वस्त नहीं किया गया है
  • याचिकाकर्ताओं ने यह तथ्य छिपाया कि
    • मिल से प्रतिबंधित लकड़ी बरामद हुई है
  • सरकार ने भरोसा दिलाया कि
    👉 कानूनी प्रक्रिया और सुनवाई का अवसर देने के बाद ही कोई कार्रवाई होगी

🛑 अंतरिम राहत: पुलिस को सख्त निर्देश

हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश में—

✅ पुलिस को निर्देश दिया कि
याचिकाकर्ताओं के जीवन, अंग और संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए

साथ ही, कोर्ट ने राज्य सरकार और अन्य पक्षों से
📅 9 फरवरी 2026 तक जवाब मांगा है।


📌 क्यों है यह फैसला बेहद अहम?

👉 यह मामला सिर्फ एक परिवार का नहीं है
👉 यह संविधान, कानून और नागरिक अधिकारों का सवाल है
👉 यह तय करेगा कि—

  • क्या सरकार अपराध से पहले ही सजा दे सकती है?
  • क्या बुलडोजर कानून से ऊपर है?
  • क्या आम नागरिक की संपत्ति सुरक्षित है?

✍️ सरकारी कलम की टिप्पणी

सरकारी कलम मानता है कि—

कानून का राज तभी संभव है, जब न्यायपालिका स्वतंत्र हो और
कार्यपालिका संवैधानिक सीमाओं में रहकर काम करे

बुलडोजर से नहीं,
⚖️ कानून और न्याय से अपराध पर लगाम लगनी चाहिए।


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