⚖️ सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्ति रद्द करना गैरकानूनी👨‍🏫 दशकों पुरानी नियुक्ति को चुनौती देना मनमानी : इलाहाबाद हाईकोर्ट

यहाँ सरकारी कलम (www.sarkarikalam.com) के लिए शिक्षक-पक्षीय, संवैधानिक और नज़ीर-आधारित तैयार लेख प्रस्तुत है 👇


⚖️ सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्ति रद्द करना गैरकानूनी

👨‍🏫 दशकों पुरानी नियुक्ति को चुनौती देना मनमानी : इलाहाबाद हाईकोर्ट

प्रयागराज।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी कर्मचारी की सेवानिवृत्ति के बाद उसकी दशकों पुरानी नियुक्ति की वैधता पर सवाल उठाना या उसे रद्द करना न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि गैरकानूनी और मनमाना भी है

इसी टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अजित कुमार एवं न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद इंटर कॉलेज, कुशीनगर की प्रबंध समिति की विशेष अपील खारिज करते हुए सेवानिवृत्त शिक्षक शंभू राव की अपील स्वीकार कर ली। ⚖️


📌 क्या था पूरा मामला?

  • शंभू राव की नियुक्ति वर्ष 1989 में सहायक शिक्षक के रूप में हुई थी
  • उन्होंने 33 वर्षों तक निरंतर सेवा दी
  • वर्ष 2022 में वे सेवानिवृत्त हुए

सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद शिक्षा विभाग ने उनकी शैक्षिक योग्यता पर सवाल उठाते हुए 1989 में दी गई नियुक्ति की स्वीकृति को वापस ले लिया

इसी कार्रवाई को चुनौती देते हुए मामला हाईकोर्ट पहुंचा।


👨‍⚖️ कोर्ट की अहम टिप्पणी

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा—

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🔹 नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध सेवानिवृत्ति के साथ ही समाप्त हो जाता है
🔹 धोखाधड़ी या जालसाजी के ठोस प्रमाण के बिना वर्षों बाद पुरानी नियुक्ति रद्द नहीं की जा सकती
🔹 दशकों पुरानी फाइलें खोलना प्रशासनिक स्थिरता के सिद्धांतों के विरुद्ध है

कोर्ट ने यह भी कहा कि विभाग यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि शंभू राव ने नियुक्ति के समय कोई फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत किया था।


⏳ “संदेह था तो नियुक्ति के समय जांच होनी चाहिए थी”

हाईकोर्ट ने दो टूक कहा—

यदि कर्मचारी की योग्यता को लेकर कोई संदेह था,
तो उसकी जांच नियुक्ति के समय ही की जानी चाहिए थी,
न कि 33 साल सेवा लेने और वेतन देने के बाद

कोर्ट ने इसे मनमाना प्रशासनिक रवैया करार दिया।


💰 पेंशन और बकाया पर भी सख्त रुख

अदालत ने सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान में हुई देरी को भी गंभीरता से लिया।

कोर्ट ने पाया कि—

  • शंभू राव को
    • जीपीएफ,
    • पेंशन,
    • और अन्य देय राशि
      के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी
  • अवमानना याचिका दायर करने के बाद ही भुगतान हुआ

कोर्ट ने स्पष्ट कहा—

“वेतन और पेंशन कर्मचारी का कानूनी अधिकार है, कृपा नहीं।”


📜 ब्याज सहित भुगतान का आदेश

हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि—

✅ शंभू राव को
✅ उनके सभी सेवानिवृत्ति लाभों पर
देय तिथि से वास्तविक भुगतान की तिथि तक
6% वार्षिक ब्याज दिया जाए


🎓 शिक्षकों के लिए नज़ीर

यह फैसला उन हजारों शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए मजबूत नज़ीर है, जिनकी—

  • सेवानिवृत्ति के बाद
  • अचानक नियुक्ति या योग्यता पर सवाल उठाए जाते हैं
  • और पेंशन व लाभ रोके जाते हैं

✍️ सरकारी कलम की टिप्पणी

सरकारी कलम मानता है कि यह निर्णय—

🟢 शिक्षकों के सम्मान और सुरक्षा की गारंटी है
🟢 मनमाने प्रशासनिक फैसलों पर करारा तमाचा है
🟢 यह स्पष्ट संदेश देता है कि

सेवा लेने के बाद अधिकार छीनना कानून नहीं, अन्याय है

सरकार और विभागों को यह समझना होगा कि
📌 शिक्षक कोई फाइल नहीं, बल्कि पूरी ज़िंदगी सेवा देने वाला कर्मी होता है।

यह फैसला संवैधानिक मूल्यों, न्याय और मानवीय गरिमा की जीत है। 📚⚖️


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