⚖️ “सर तन से जुदा” जैसे नारे भारत की संप्रभुता को चुनौती
🚨 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं, हिंसा और सशस्त्र विद्रोह का आह्वान : हाईकोर्ट
प्रयागराज।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम और दूरगामी प्रभाव वाले फैसले में स्पष्ट किया है कि “गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा” जैसे नारे न तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आते हैं और न ही इन्हें धार्मिक अधिकार के रूप में संरक्षण दिया जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि ऐसे नारे कानून के शासन के विरुद्ध हैं और भारत की संप्रभुता व अखंडता को सीधी चुनौती देते हैं।
इसी टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने बरेली में हुए हिंसक विरोध-प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार आरोपी रिहान की जमानत अर्जी खारिज कर दी। ⚖️
🔥 बरेली हिंसा का पूरा मामला
कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत रिकॉर्ड के अनुसार—
- 26 सितंबर 2025 को बरेली के कोतवाली थाना क्षेत्र में गंभीर हिंसा हुई
- निषेधाज्ञा लागू होने के बावजूद
- कथित रूप से इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के अध्यक्ष मौलाना तौकीर रजा व एक अन्य द्वारा
- इस्लामिया इंटर कॉलेज में भीड़ जुटाने के लिए उकसाया गया
आरोप है कि भीड़ ने—
🔹 भड़काऊ और विवादित नारे लगाए
🔹 पुलिस पर पथराव किया
🔹 पेट्रोल बम से हमला किया
🔹 और फायरिंग भी की
इस हिंसा में कई पुलिसकर्मी घायल हुए और सरकारी व निजी संपत्तियों को भारी नुकसान पहुंचा। 🚓💥
👤 आरोपी रिहान की भूमिका
रिहान को अन्य लोगों के साथ मौके से गिरफ्तार किया गया था और उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई।
- याची के अधिवक्ता ने दावा किया कि उसे झूठे मामले में फंसाया गया
- जबकि अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने अदालत को बताया कि
- आरोपी भीड़ के साथ नारे लगा रहा था
- पुलिस के हस्तक्षेप पर भीड़ और अधिक हिंसक हो गई
⚠️ “सर तन से जुदा” नारा : न भारत की परंपरा, न धर्म का हिस्सा
हाईकोर्ट ने बेहद सख्त शब्दों में कहा कि—
“सर तन से जुदा” जैसे नारे का उद्भव भारत की सांस्कृतिक, कानूनी या धार्मिक परंपराओं से नहीं जुड़ा है, बल्कि यह पड़ोसी देश के ईशनिंदा कानूनों और वहां हुई हिंसक घटनाओं से प्रभावित प्रतीत होता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—
- नारा-ए-तकबीर
- जय श्री राम
जैसे धार्मिक जयकारों और हिंसा को उकसाने वाले नारों के बीच स्पष्ट अंतर है।
जब तक धार्मिक नारे दुर्भावनापूर्ण ढंग से डराने या हिंसा भड़काने के लिए इस्तेमाल नहीं किए जाते, तब तक वे अपराध नहीं हैं।
📜 संविधान ने अधिकार दिए हैं, अराजकता का लाइसेंस नहीं
न्यायालय ने कहा—
🟢 भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
- शांतिपूर्ण सभा का अधिकार
देता है, लेकिन इन अधिकारों की स्पष्ट संवैधानिक सीमाएं हैं।
जब कोई भीड़ किसी व्यक्ति के लिए सिर कलम करने जैसे मृत्युदंड की मांग करती है, तो यह सीधे-सीधे कानून के शासन का अपमान है।
अपराध की गंभीरता, उपलब्ध साक्ष्य और परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने आरोपी को किसी भी प्रकार की राहत देने से इनकार कर दिया।
🕊️ पैगंबर मोहम्मद के आदर्शों के भी विरुद्ध : कोर्ट
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि—
इस्लाम धर्म के नाम पर लगाए जाने वाले ऐसे हिंसक नारे पैगंबर मोहम्मद के आदर्शों के भी विपरीत हैं।
कोर्ट ने पैगंबर मोहम्मद के जीवन की एक घटना का उल्लेख करते हुए कहा—
- ताइफ नगर में एक गैर-मुस्लिम पड़ोसी
- उनके रास्ते में कूड़ा फेंककर परेशान करती थी
- पैगंबर ने कभी प्रतिशोध नहीं लिया
- बल्कि बीमारी में उससे मिलने गए
यही दया, करुणा और क्षमा इस्लाम का मूल संदेश है।
इसलिए किसी के सिर कलम करने का नारा लगाना न तो धर्म का सम्मान है और न ही पैगंबर की शिक्षाओं का पालन।
✍️ सरकारी कलम की टिप्पणी
सरकारी कलम मानता है कि यह फैसला—
✅ संविधान और कानून के शासन को मजबूती देता है
✅ धार्मिक भावनाओं की आड़ में हिंसा को स्पष्ट रूप से खारिज करता है
✅ यह संदेश देता है कि भारत में न्याय केवल कानून करेगा, भीड़ नहीं
धर्म हो या विचार—
🔹 हिंसा उसका रास्ता नहीं हो सकती
🔹 और न ही संविधान इसकी अनुमति देता है
यह निर्णय सामाजिक सौहार्द और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। 🇮🇳⚖️
