⚖️ इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
पार्ट-टाइम अनुदेशक का अनुभव हेडमास्टर पद के लिए मान्य नहीं

⚖️ इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
पार्ट-टाइम अनुदेशक का अनुभव हेडमास्टर पद के लिए मान्य नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जूनियर हाईस्कूलों में कार्यरत हजारों पार्ट-टाइम (अंशकालिक) अनुदेशकों को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि—

👉 जूनियर हाईस्कूल में पार्ट-टाइम अनुदेशक के रूप में किया गया कार्य
👉 प्रधानाध्यापक (हेडमास्टर) पद पर नियुक्ति के लिए आवश्यक पांच वर्ष के शिक्षण अनुभव में नहीं जोड़ा जा सकता।

यह फैसला न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ द्वारा सुनाया गया।


📌 क्या कहा हाईकोर्ट ने?

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

  • नियमों में जिस पांच वर्ष के शिक्षण अनुभव की बात की गई है,
  • उसका आशय केवल नियमित और पूर्णकालिक शिक्षण सेवा से है,
  • न कि अंशकालिक, संविदा या आकस्मिक कार्य से।

कोर्ट ने यह भी कहा कि पार्ट-टाइम अनुदेशक और नियमित सहायक अध्यापक—

  • नियुक्ति प्रक्रिया,
  • शैक्षणिक योग्यता,
  • कार्यदायित्व,
  • और सेवा शर्तों
    👉 सभी दृष्टि से एक-दूसरे से भिन्न होते हैं।

📚 किस नियम का दिया गया हवाला?

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में
उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त बेसिक स्कूल
(जूनियर हाईस्कूल) अध्यापकों की भर्ती एवं सेवा शर्तें नियमावली, 1978

के नियम 4(2) का हवाला दिया।

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इस नियम के अनुसार—
📝 प्रधानाध्यापक पद के लिए न्यूनतम पांच वर्ष का शिक्षण अनुभव अनिवार्य है,
जो केवल नियमित सहायक अध्यापक या प्रधानाध्यापक के रूप में सेवा से ही पूरा हो सकता है।


👩‍⚖️ याचिकाकर्ताओं की दलील क्यों खारिज?

प्रयागराज निवासी डिंपल सिंह सहित 13 याचिकाकर्ताओं और मुकेश कुमार ने कोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

उनका कहना था कि—

  • वे वर्ष 2013 से कला एवं कार्य शिक्षा जैसे विषयों में पार्ट-टाइम अनुदेशक के रूप में कार्यरत हैं
  • उन्होंने प्रधानाध्यापक भर्ती की लिखित परीक्षा भी पास कर ली है
  • इसलिए उनके अनुभव को भी शिक्षण अनुभव माना जाए

❌ लेकिन हाईकोर्ट ने यह दलील स्वीकार नहीं की और याचिकाएं खारिज कर दीं।


🛑 “खेल के नियम बदले गए” वाली दलील भी नामंजूर

याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि—

चयन प्रक्रिया के बीच में अनुभव संबंधी शर्तें बदलकर
“खेल के नियम बदल दिए गए”

इस पर कोर्ट ने कहा—
📌 19 फरवरी 2021 के मूल सरकारी आदेश में ही स्पष्ट था कि

  • अनुभव केवल
    👉 सहायक अध्यापक के रूप में पांच वर्ष की नियमित सेवा का ही मान्य होगा।

इसलिए नियमों में किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया गया है।


🏫 प्रधानाध्यापक का पद क्यों अलग है?

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि—

प्रधानाध्यापक का पद केवल कक्षा में पढ़ाने तक सीमित नहीं होता।

यह पद—

  • विद्यालय का प्रशासनिक नेतृत्व,
  • शैक्षणिक मार्गदर्शन,
  • और समग्र प्रबंधन से जुड़ा होता है।

👉 ऐसे पद के लिए नियमित सेवा का अनुभव अनिवार्य है।


⚖️ संविधान का भी दिया हवाला

कोर्ट ने कहा कि—

  • पार्ट-टाइम अनुदेशकों को हेडमास्टर बनने की अनुमति देना
  • असमान को समान मानने जैसा होगा,

जो कि
📜 संविधान के अनुच्छेद 14 और 16
(समानता और समान अवसर)
के विरुद्ध है।


✍️ सरकारी कलम की टिप्पणी

यह फैसला कानूनी दृष्टि से भले ही नियमों के अनुरूप हो,
लेकिन यह सवाल भी छोड़ जाता है कि—

वर्षों से स्कूलों में सेवा दे रहे पार्ट-टाइम अनुदेशकों का भविष्य क्या होगा?

  • वे पढ़ाते भी हैं
  • स्कूल व्यवस्था का हिस्सा भी हैं
  • लेकिन पदोन्नति और अनुभव में उन्हें बार-बार बाहर रखा जाता है

📢 सरकारी कलम मानती है कि—

  • नियमित शिक्षकों के अधिकार सुरक्षित रहना जरूरी है
  • लेकिन साथ ही सरकार को
    👉 लंबे समय से कार्यरत अनुदेशकों के लिए
    👉 स्पष्ट नीति और वैकल्पिक अवसर भी बनाने चाहिए

न्याय तभी पूर्ण होगा, जब नियमों के साथ संवेदनशीलता भी हो।

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