⚖️ लिव-इन रिलेशनशिप अपराध नहीं, बालिगों की सुरक्षा से इनकार नहीं कर सकता राज्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम और संवेदनशील फैसले में साफ कर दिया है कि लिव-इन रिलेशनशिप भले ही सामाजिक रूप से सभी को स्वीकार न हो, लेकिन इसे गैरकानूनी या अपराध नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने दो टूक कहा कि शादी की पवित्रता के बिना साथ रहना भी संविधान के तहत संरक्षित व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है।
न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे बालिग जोड़ों की पुलिस सुरक्षा से जुड़ी कई याचिकाओं को स्वीकार करते हुए राज्य और पुलिस की जिम्मेदारी तय की।
🧑⚖️ बालिग को पार्टनर चुनने का पूरा अधिकार
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा—
👉 एक बार कोई व्यक्ति बालिग हो जाए और अपनी मर्जी से पार्टनर चुन ले, तो परिवार या समाज का कोई भी व्यक्ति उनके शांतिपूर्ण जीवन में दखल नहीं दे सकता।
👉 यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह हर नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करे, चाहे वह विवाहित हो या बिना शादी के साथ रह रहा हो।
🚓 पुलिस सुरक्षा देना अनिवार्य
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि—
- यदि लिव-इन कपल को किसी तरह का खतरा हो
- तो वे इस आदेश की प्रमाणित प्रति लेकर पुलिस कमिश्नर / एसएसपी / एसपी से संपर्क कर सकते हैं
- पुलिस पहले यह सुनिश्चित करेगी कि याची बालिग हैं और सहमति से साथ रह रहे हैं
- इसके बाद तुरंत सुरक्षा प्रदान की जाएगी
कोर्ट ने साफ कहा कि पुलिस किसी भी तरह की जबरदस्ती या दखल नहीं दे सकती, जब तक कि जोड़े के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज न हो।
📜 सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि—
🔹 लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश
🔹 एस. खुशबू बनाम कन्नियम्मल
जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि लिव-इन रिलेशनशिप गैरकानूनी नहीं है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि किरण रावत केस में खंडपीठ की टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की बाध्यकारी मिसालों के अनुरूप नहीं थी।
🏛️ “कोर्ट को फैसलों पर जज करने का हक नहीं”
हाईकोर्ट ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा—
“याची पढ़े-लिखे हैं, बालिग हैं और उन्होंने अपनी मर्जी से साथ रहने का फैसला किया है। कोर्ट को उनके व्यक्तिगत फैसलों पर नैतिक निर्णय देने का कोई अधिकार नहीं है।”
यदि उम्र को लेकर संदेह हो, तो पुलिस ऑसिफिकेशन टेस्ट या अन्य वैधानिक प्रक्रिया अपना सकती है।
❌ “सामाजिक ताना-बाना कमजोर होता है”—दलील खारिज
राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि—
- लिव-इन रिलेशनशिप सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करती है
- पुलिस को निजी फैसलों की सुरक्षा के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता
लेकिन हाईकोर्ट ने यह दलील पूरी तरह खारिज करते हुए कहा—
👉 व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सामाजिक नैतिकता के नाम पर कुचला नहीं जा सकता।
📌 सरकारी कलम की राय
यह फैसला सिर्फ लिव-इन जोड़ों के लिए नहीं, बल्कि संविधान, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की मजबूती का प्रतीक है।
सरकारी कलम मानती है कि—
🟢 राज्य का काम नैतिक पहरेदारी नहीं
🟢 बल्कि नागरिकों की जान और आज़ादी की रक्षा करना है
⚖️ यह आदेश बताता है कि कानून व्यक्ति के साथ खड़ा है, भीड़ के साथ नहीं।
👉 ऐसे ही संवेदनशील, तथ्यात्मक और अधिकार आधारित खबरों के लिए पढ़ते रहिए
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