⚖️ शिक्षक भर्ती में बड़ा फैसला — B.Ed (Special Education) अभ्यर्थी TGT/PGT से बाहर नहीं किए जा सकते 🎓✊
शिक्षक भर्ती से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण और राहत भरे निर्णय में दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि
👉 B.Ed (Special Education) डिग्रीधारक अभ्यर्थियों को
👉 TGT / PGT (सामान्य विषय) के पदों के लिए
👉 अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता,
यदि भर्ती विज्ञापन में इस योग्यता को स्पष्ट रूप से बाहर नहीं किया गया हो।
यह फैसला हजारों शिक्षकों और अभ्यर्थियों के हित में माना जा रहा है।
👨⚖️ हाईकोर्ट की दो टूक टिप्पणी
न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की खंडपीठ ने कहा—
📌 “जब भर्ती विज्ञापन में किसी योग्यता पर कोई रोक नहीं लगाई गई है, तो बाद में उम्मीदवार को अयोग्य ठहराना पूरी तरह अनुचित है।”
कोर्ट ने दिल्ली सरकार और DSSSB द्वारा दायर याचिकाओं को खारिज करते हुए
👉 केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) के आदेशों को बरकरार रखा।
📘 B.Ed (Special Education) केवल विशेष शिक्षक तक सीमित नहीं
हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि—
✔️ B.Ed (Special Education) को केवल विशेष शिक्षकों तक सीमित नहीं किया जा सकता
✔️ भर्ती विज्ञापन में केवल “Teaching में डिग्री/डिप्लोमा” की शर्त थी
✔️ जिसे B.Ed (Special Education) अभ्यर्थी भी पूरा करते हैं
कोर्ट ने भारतीय पुनर्वास परिषद (RCI) के हलफनामे का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि—
👉 B.Ed (Special Education) धारक
👉 सामान्य विद्यार्थियों को पढ़ाने में भी सक्षम होते हैं
👉 उन्हें अतिरिक्त व विशेष प्रशिक्षण प्राप्त होता है
🧑⚖️ वरिष्ठ अधिवक्ता की मजबूत पैरवी
इस अहम मामले में प्रतिवादी उमा रानी की ओर से
वरिष्ठ अधिवक्ता अनुज अग्रवाल ने अपनी टीम के साथ प्रभावी पैरवी की।
हाईकोर्ट ने उनके तर्कों को स्वीकार करते हुए CAT के आदेश को सही ठहराया।
🌟 इस फैसले का व्यापक प्रभाव
इस निर्णय से—
✔️ शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी
✔️ मनमानी अयोग्यता पर रोक लगेगी
✔️ हजारों B.Ed (Special Education) अभ्यर्थियों को बड़ी राहत मिलेगी
✍️ सरकारी कलम की स्पष्ट राय
सरकारी कलम मानता है कि—
📢 योग्यता को सम्मान मिलना चाहिए, न कि तकनीकी बहानों से उसे नकारा जाना चाहिए।
यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से सही है, बल्कि
👉 समावेशी शिक्षा
👉 शिक्षक अधिकार
👉 निष्पक्ष भर्ती प्रक्रिया
की दिशा में एक मजबूत कदम है।
🕉️ कोर्ट की सीख — माता-पिता जहां रहते हैं, वही संतान के लिए मंदिर
(संक्षिप्त लेकिन प्रेरक)
मध्यप्रदेश के बैतूल परिवार न्यायालय में एक मामले की सुनवाई के दौरान
👩⚖️ जज ने धार्मिक व नैतिक उदाहरण देते हुए बेटे को
👉 अपनी मां को भरण-पोषण राशि देने के लिए राजी कर लिया।
कोर्ट ने कहा—
🛕 “माता-पिता संतान के लिए देवता के समान होते हैं।
जहां माता-पिता रहते हैं, वही स्थान संतान के लिए मंदिर के समान होता है।”
इस मानवीय दृष्टिकोण से अंततः बेटा मां की जिम्मेदारी उठाने को तैयार हो गया।
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