⚖️ झूठा एससी-एसटी केस दर्ज कराने पर युवक को 5 साल की सजा; कोर्ट ने कहा—चार्जशीट से पहले न दी जाए राहत राशि
— सरकारी कलम विशेष रिपोर्ट
एससी-एसटी एक्ट जैसे संवेदनशील कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए कोर्ट ने एक सख्त और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जमीन विवाद में झूठा एससी-एसटी केस दर्ज कराने वाले विकास कुमार को कोर्ट ने दोषी करार देते हुए 5 साल की कैद और 10,000 रुपये जुर्माना की सजा सुनाई है।
यह फैसला एससी-एसटी एक्ट के विशेष न्यायाधीश विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने सुनाया।
🧑⚖️ कोर्ट का कड़ा संदेश: झूठे केस पर कोई राहत नहीं
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि दोषी विकास कुमार को राज्य सरकार से कोई राहत या मुआवजा मिला हो, तो उसे तुरंत वापस लिया जाए।
इसके साथ ही कोर्ट ने डीएम और पुलिस कमिश्नर को यह महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिया:
❗ “केवल एफआईआर दर्ज होने मात्र से मामला सिद्ध नहीं हो जाता।
जांच के बाद जब पुलिस चार्जशीट दायर करती है, तभी मामला बनता है।”
🚫 क्या बदल गया कोर्ट के आदेश से?
कोर्ट ने साफ कहा कि:
🔴 एफआईआर दर्ज होते ही राहत राशि न दी जाए
क्योंकि इस वजह से झूठे मुकदमे दर्ज कराने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है।
अब से:
🟢 पुलिस चार्जशीट दायर करेगी तभी पीड़ित को प्रतिकर मिलेगा।
📌 चार्जशीट से पहले क्या मदद मिलेगी?
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चार्जशीट दर्ज होने से पहले पीड़ित को केवल ये सुविधाएं दी जाएँ:
- 🍛 भोजन
- 🩺 चिकित्सा
- 👚 कपड़े
- 🏠 आश्रय
- 🚖 परिवहन सुविधा
- 💰 भरण-पोषण
- 🛡 सुरक्षा
लेकिन कोई आर्थिक राहत या मुआवज़ा नहीं।
🔍 अगर विवेचक फाइनल रिपोर्ट लगा दे तो?
कोर्ट ने आदेश दिया कि:
❌ यदि विवेचक फाइनल रिपोर्ट लगा देता है
तो पीड़ित को तब तक कोई राहत या प्रतिकर न दिया जाए
जब तक
- कोर्ट दोनों पक्षों की बात सुनकर
- विपक्षी को आरोपी के रूप में तलब न कर ले।
🟩 सरकारी कलम की राय
इस निर्णय से दो बातें स्पष्ट होती हैं:
1️⃣ एससी-एसटी एक्ट के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए न्यायपालिका सख्त है।
2️⃣ असली पीड़ितों तक न्याय पहुंचाने के लिए झूठे मामलों को अलग करना आवश्यक है।
यह आदेश भविष्य में झूठे मामलों को कम करेगा और कानून की विश्वसनीयता को मजबूत करेगा।
