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🔴 भारत में महिला मास्टरमाइंड की बढ़ती भूमिका: आतंकवाद विरोधी एजेंसियों की नई चुनौती
भारतीय खुफिया एजेंसियों के इनपुट के अनुसार पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों ने अब अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। पहले जहां महिलाएँ केवल हनीट्रैप ऑपरेशनों में इस्तेमाल की जाती थीं, वहीं अब उन्हें विभिन्न नेटवर्कों में मुख्य संचालक (Key Commanders) की भूमिका में आगे बढ़ाया जा रहा है।
यह बदलाव सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई चुनौती के रूप में सामने आया है।
📌 मुंबई का धर्मांतरण नेटवर्क—नसरीन की भूमिका सामने आई
अवैध धर्मांतरण रैकेट चलाने वाले जलालुद्दीन उर्फ छांगुर ने मुंबई में एक परिवार को अपने जाल में फंसाया।
- नवीन वोहरा की पत्नी नीतू के धर्मांतरण के बाद उसका नाम नसरीन बताया गया
- एजेंसियों के अनुसार, ब्रेनवॉश के बाद वह नेटवर्क में केंद्रिय भूमिका में आ गई
- इस गिरोह के संचालन में वह कमांडर-स्तर की जिम्मेदारियाँ संभालती दिखाई दी
📌 पुणे–कोलकाता मॉड्यूल की कमांडर—आयशा (पूर्व में एस.बी. कृष्णा)
आगरा पुलिस द्वारा उजागर धर्मांतरण गैंग में एक और महिला का नाम सामने आया—
- कोलकाता की रहने वाली एस.बी. कृष्णा, जो बाद में आयशा बनी
- पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान कुछ संदिग्ध संपर्कों में आने के बाद उसका ब्रेनवॉश हुआ
- आतंकी संगठन से जुड़े अब्दुल रहमान के जेल जाने के बाद आयशा ने नेटवर्क की कमांड अपने हाथ में ले ली
📌 डॉ. शाहीन—आतंकी नेटवर्क का हाई-प्रोफाइल चेहरा
देश के कई राज्यों में हुई जांचों में डॉ. शाहीन का नाम प्रमुखता से सामने आया है।
- वह MBBS और MD कर चुकी है
- खुफिया एजेंसियों के अनुसार, उसने फरीदाबाद से लखनऊ, सहारनपुर से कश्मीर तक अपने नेटवर्क का विस्तार किया
- एजेंसियां इसे फुल-स्केल मॉड्यूल ऑपरेटर के रूप में देख रही हैं
- जांच एजेंसियों के मुताबिक डॉ. शाहीन का कामकाज अत्यधिक सुनियोजित और तकनीकी रूप से उन्नत था
📌 मुंबई की कुख्यात लेडी डॉन—हसीना पारकर (ऐतिहासिक संदर्भ)
महिला अपराधियों की लंबी सूची में
- दाऊद इब्राहिम की बहन हसीना पारकर भी प्रमुख रही
- 90 के दशक में दाऊद के पाकिस्तान भागने के बाद मुंबई में कई मामलों में उसका प्रभाव देखा गया
- अपराध जगत में उसका नाम खौफ का पर्याय रहा
- वर्ष 2014 में उसकी हृदयगति रुकने से मृत्यु हुई
यह उदाहरण दिखाता है कि भारत में महिला अपराधियों या नेटवर्क संचालकों की भूमिका कोई नई नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में आतंकी संगठनों द्वारा महिलाओं को फ्रंटलाइन पर लाना सुरक्षा एजेंसियों की चिंता का विषय है।
📌 क्या है सुरक्षा एजेंसियों की चिंता?
- महिलाओं का इस्तेमाल ऑपरेशनल कमान में
- ब्रेनवॉश व ऑनलाइन रैडिकलाइजेशन के बढ़ते मामले
- धर्मांतरण रैकेट और अंतरराज्यीय नेटवर्क का विस्तार
- सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड ऐप के जरिए गुप्त संवाद
📌 आगे क्या?
NIA, ATS और इंटेलिजेंस ब्यूरो ऐसे मामलों पर सख्त निगरानी कर रही हैं।
कई राज्यों में
- छापे
- पूछताछ
- डिजिटल फॉरेंसिक
जारी है ताकि इस पैटर्न को तोड़ा जा सके।
