दिल्ली धमाकों की प्लानिंग में ‘Session App’ का इस्तेमाल! खुफिया एजेंसियों की जांच में चौंकाने वाला खुलासा 🚨


दिल्ली धमाकों की प्लानिंग में ‘Session App’ का इस्तेमाल! खुफिया एजेंसियों की जांच में चौंकाने वाला खुलासा 🚨

दिल्ली धमाकों की जांच में खुफिया एजेंसियों को बड़ा सुराग मिला है। सूत्रों के अनुसार, आतंकियों ने अपनी बातचीत और हमलों की प्लानिंग के लिए कम-प्रचलित ‘Session’ मैसेजिंग एप्लीकेशन का सबसे अधिक इस्तेमाल किया।
यह ऐप इसलिए चर्चा में है क्योंकि इसे चलाने के लिए न न मोबाइल नंबर चाहिए और न ई-मेल आईडी, जिससे यूजर की पहचान लगभग असंभव हो जाती है।


क्यों Session ऐप बना आतंकियों का पसंदीदा हथियार?

खुफिया सूत्रों का कहना है कि दिल्ली धमाकों की साजिश में शामिल संदिग्ध डॉक्टर लंबे समय से Session App के माध्यम से एक-दूसरे से संपर्क में थे। यह ऐप कई कारणों से ट्रेस करना बेहद मुश्किल बनाता है:

  • ऐप IP address छिपा देता है
  • मैसेज दुनिया भर के कई सर्वर लोकेशन्स से रूट होता है
  • ऐप लोकेशन डाटा या मेटा-डाटा सेव नहीं करता
  • पहचान के लिए न मोबाइल नंबर, न ई-मेल
  • UID सिर्फ बाइनरी कोड रूप में दिखाई देता है

इसी वजह से लोकप्रिय सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स की जगह आतंकियों ने इस ऐप को चुना।


डॉक्टर गैंग की दिल्ली में प्लानिंग — जैश और अलकायदा की छाया में तैयारी

जांच में सामने आया है कि श्रीनगर में पोस्टर लगाने वाले डॉक्टर गैंग के सदस्य जैश-ए-मोहम्मद और अलकायदा संगठनों की शह पर काम कर रहे थे।
ये लोग पेशे से डॉक्टर थे, इसलिए उन पर किसी को शक भी नहीं हुआ।
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार:

WhatsApp Channel Join Now
WhatsApp Group Join Now
Telegram Channel Join Now
  • टीम पिछले कुछ समय से दिल्ली में हमले की प्लानिंग कर रही थी
  • इनके मोबाइल की जांच में Session App की गतिविधियां सामने आईं
  • फील्ड में विस्फोटक और अन्य सामग्री जुटाई जा रही थी
  • संपर्क बातचीत पूरी तरह Session के माध्यम से चल रही थी

यह पूरा नेटवर्क फुल-प्रूफ सीक्रेसी से संचालित किया जा रहा था।


Session App कैसे काम करता है? — आसान भाषा में समझें

साइबर एक्सपर्ट्स के मुताबिक, Session एक प्राइवेसी-केंद्रित मैसेजिंग ऐप है जिसका उद्देश्य डेटा गुमनामी (anonymity) को अधिकतम करना है।

नीचे इसके काम करने का सरल तरीका:

🔹 1. अकाउंट बनाने के लिए सिर्फ Display Name चाहिए

  • ऐप इंस्टॉल करने के बाद केवल “नाम” डालकर अकाउंट बन जाता है
  • न OTP, न ईमेल वेरिफिकेशन

🔹 2. मैसेजिंग पूरी तरह अनट्रेसेबल

  • मैसेज कई देशों के सर्वर घूमकर पहुंचते हैं
  • इसलिए sender–receiver की लोकेशन पता करना लगभग असंभव

🔹 3. Zero Metadata Policy

  • ऐप लोकेशन, IMEI, Metadata, Contact List—कुछ भी सेव नहीं करता

🔹 4. मीडिया, ग्रुप चैट, वॉयस मैसेज सब उपलब्ध

  • फ़ोटो भेजना
  • वीडियो और वॉयस मैसेज
  • QR स्कैन द्वारा यूजर जोड़ना
  • Secret ग्रुप बनाना

इन सभी सुविधाओं के कारण यह ऐप गोपनीयता चाहने वालों के लिए उपयुक्त है, लेकिन दुर्भाग्य से इसका दुरुपयोग भी आसान है।


साइबर विशेषज्ञों ने क्या कहा?

साइबर एक्सपर्ट आर्य त्यागी का कहना है:

  • Session उन एप्लीकेशंस में आता है जिनका प्रयोग अनाम और सुरक्षित संचार के लिए किया जाता है।
  • इसमें यूजर की लोकेशन या IP ट्रैक करना लगभग असंभव होता है।
  • मैसेज कई देशों के सर्वर से गुज़रते हैं — इसी वजह से निगरानी भी बेहद कठिन।

एजेंसियों को यह ऐप तब पता चला जब गिरफ्तार आरोपियों के मोबाइल की फॉरेंसिक जांच की गई।


जांच किस दिशा में बढ़ रही है?

खुफिया एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि:

  • नेटवर्क में कुल कितने सदस्य थे
  • किस-किस लोकेशन से Session का उपयोग हुआ
  • प्लानिंग कितने समय से चल रही थी
  • दिल्ली धमाकों में इस्तेमाल मैटेरियल किन-किन चिकित्सकों ने जुटाया

जांच अधिकारी मानते हैं कि यह मामला साइबर और ग्राउंड दोनों स्तरों पर बेहद संवेदनशील है।


निष्कर्ष

दिल्ली धमाकों की जांच में ‘Session App’ का सामने आना सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ा तकनीकी चैलेंज है।
इससे साफ है कि आतंकी अब तकनीक का इस्तेमाल इतनी सावधानी से करते हैं कि उनकी पहचान और गतिविधियां लंबे समय तक छिपी रह जाएं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top