⚖️ एलएलएम प्रवेश परीक्षा: दिव्यांग अभ्यर्थी को लेखक न मिलने पर हाईकोर्ट ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मांगा स्पष्टीकरण
प्रयागराज (अमर उजाला) — कोर्ट की कड़ी प्रतिक्रिया: न्यायपालिका ने विश्वविद्यालय से एक सप्ताह में जवाब मांगा। 📢
कहानी का सार — क्या हुआ?
इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक एकल पीठ, न्यायमूर्ति विवेक सारण की अध्यक्षता में, एलएलएम प्रवेश परीक्षा 2025-26 के सन्दर्भ में एक गंभीर शिकायत की सुनवाई करते हुए नाराज़गी जाहिर की। वाराणसी के दृष्टिबाधित अभ्यर्थी संतोष कुमार त्रिपाठी ने याचिका दायर की कि परीक्षा के दिनों में विश्वविद्यालय द्वारा लेखक (सहायक) उपलब्ध नहीं कराया गया, जिससे उन्हें परीक्षा केंद्र से लौटना पड़ा। 🙁
कानूनी और नीतिगत संदर्भ
याचिकाकर्ता का तर्क है कि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के 10 अगस्त 2022 के दिशानिर्देश के अनुरूप विश्वविद्यालय को विशेष आवश्यकताओं वाले अभ्यर्थियों के लिए समुचित सुविधा प्रदान करनी चाहिए थी — जिसमें लेखक की उपलब्धता भी शामिल है। उन दिशानिर्देशों का पालन न किए जाने से दिव्यांग अभ्यर्थी का मौलिक अधिकार प्रभावित हुआ है, ऐसा याचिकाकर्ता का दावा है। 📜
हाईकोर्ट का आदेश और अगला कदम
उच्च न्यायालय ने मामले में तीव्रता से संज्ञान लेते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एक सप्ताह के भीतर स्पष्टीकरण माँगा। विश्वविद्यालय की ओर से पेश अधिवक्ता ने अतिरिक्त समय की गुज़ारिश की, जिसे कोर्ट ने सुनकर अगली सुनवाई की तारीख 18 नवंबर निर्धारित की। 🗓️
यूनिवर्सिटी के लिए चेकलिस्ट — अब क्या करना चाहिए?
यहाँ कुछ तात्कालिक कदम दिए जा रहे हैं जो विश्वविद्यालय तुरंत उठा सकता है ताकि ऐसी परिस्थितियाँ भविष्य में न बनें:
- स्पष्ट जवाब: कोर्ट को एक सप्ताह में विस्तृत स्पष्टीकरण भेजें — क्यों लेखक उपलब्ध नहीं कराया गया और भविष्य में क्या सुधार किए जाएंगे।
- नीतिगत अद्यतन: परीक्षा संचालन में दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए चेकलिस्ट और ज़िम्मेदार अधिकारी निर्धारित करें।
- रिकॉर्ड और सबूत: संबंधित संचार, स्टाफ अलॉटमेंट, और तैयारियों का लेखा-जोखा रखें ताकि कोर्ट में प्रस्तुत किया जा सके।
- रिमीडीएशन: प्रभावित अभ्यर्थी को उपयुक्त राहत/पुनर्परीक्षा/वैकल्पिक व्यवस्था देने पर विचार करें।
दिव्यांग अधिकार और शिक्षा तक पहुँच
यह मामला सिर्फ़ एक परीक्षा घटना नहीं है — यह व्यापक सामाजिक सवाल उठाता है: क्या संस्थाएँ उपलब्ध सुविधाओं और नीति अनुपालन के प्रति सचेत हैं? शैक्षिक समावेशन तभी सार्थक है जब परिस्थितियाँ वास्तविक रूप से लाभान्वित करें। न्यायालय का कड़ा रूख यह संकेत देता है कि संस्थानों को संवेदनशीलता और दायित्व के साथ काम करना होगा। ♿️📚
समाप्ति / निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश चिंतनीय परिस्थितियों पर शीघ्र कार्रवाई का संकेत है। विश्वविद्यालय के जवाब और आगामी सुनवाई (18 नवंबर) से यह स्पष्ट होगा कि क्या प्रभावित अभ्यर्थी को न्यायोचित राहत मिलेगी और संस्थान भविष्य में कितने प्रभावी कदम उठाएंगे। इस खबर का हर पक्ष — विद्यार्थी, परिवार और शिक्षा संस्थान — ध्यानपूर्वक पालन करे। 🙏
हमारी कामना: शिक्षा सभी के लिए बराबर और पहुँच में हो।
