✍️ ड्यूटी की मनमानी से भड़की शिक्षामित्र — प्रशासन को भी देखना होगा अपना रवैया
📍 कन्नौज से विशेष रिपोर्ट | सरकारी कलम टीम
सरकारी मशीनरी में आज भी “ऊपर से आदेश” के नाम पर शिक्षकों और शिक्षामित्रों के साथ मनमानी का सिलसिला जारी है। कन्नौज जनपद के तिर्वा तहसील में घटी ताज़ा घटना ने फिर एक बार इस कड़वी हकीकत को उजागर कर दिया है।
प्राथमिक विद्यालय हंसापुर में तैनात शिक्षामित्र कंचन तोमर को पंचायत चुनाव के लिए बीएलओ ड्यूटी थमा दी गई। पहले यह जिम्मेदारी सहायक अध्यापिका पूनम दुबे को दी गई थी, मगर अचानक आदेश बदल गया। बिना किसी चर्चा या सहमति के कंचन तोमर को नया आदेश थमा दिया गया — यही से शुरू हुआ विवाद।
लेखपाल अमित राजपूत ने जब फोन कर ड्यूटी के लिए बुलाया, तो पहले तो कंचन ने विरोध जताया। लेकिन जब किसी ने उनकी बात सुनने की कोशिश ही नहीं की, तो उनका गुस्सा फूट पड़ा। वे सीधा तहसील पहुंचीं और नाराजगी में लेखपाल से भिड़ गईं।
अब वीडियो और खबरें तो “तमाचा” दिखा रही हैं, मगर ‘सरकारी कलम’ पूछता है — आखिर शिक्षामित्र की बात सुनी किसने?
🎓 शिक्षामित्र या हमेशा का आसान निशाना?
सालों से शिक्षा व्यवस्था में बच्चों के साथ दिन-रात मेहनत करने वाले शिक्षामित्र आज भी सम्मान और स्थायित्व के लिए संघर्षरत हैं।
एक तरफ प्रशासन हर जिम्मेदारी बिना परामर्श थोप देता है,
दूसरी ओर जब वे विरोध करते हैं तो उन्हें “दोषी” ठहरा दिया जाता है।
कंचन तोमर का व्यवहार अनुशासनहीन माना जा सकता है — पर सवाल यह है कि क्या प्रशासन का रवैया अनुशासनिक था?
क्या ड्यूटी तय करते समय शिक्षामित्रों की प्राथमिक जिम्मेदारी — यानी शिक्षण कार्य — का ध्यान रखा गया?
⚖️ एकतरफा कार्रवाई नहीं, निष्पक्ष जांच ज़रूरी
अब बीएसए कार्यालय और प्रशासनिक अफसर जांच की बात कर रहे हैं। लेकिन यह जांच तभी निष्पक्ष मानी जाएगी, जब दोनों पक्षों की बात सुनी जाए।
सिर्फ शिक्षामित्र को दोषी ठहराकर पूरा मामला खत्म कर देना, उन हजारों संविदा कर्मियों के लिए एक गलत संदेश होगा जो रोज़ अनुचित दबाव झेलते हैं।
💬 सरकारी कलम की राय
“सरकारी आदेश के नाम पर किसी की गरिमा और आत्मसम्मान कुचलना भी अपराध है। प्रशासन को समझना होगा कि सम्मान से आदेश लेना और डर से आदेश मानना — दोनों में बहुत फर्क होता है।”
🖋️ लेख: सरकारी कलम संपादकीय टीम
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