मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय ने ‘हनुमान चालीसा’ को पाठ्यक्रम में शामिल किया 🙏📚

📰 — मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय ने ‘हनुमान चालीसा’ को पाठ्यक्रम में शामिल किया 🙏📚
(संवाददाता – सरकारी कलम, बलरामपुर)


🌸 बलरामपुर को मिली सांस्कृतिक और शैक्षणिक पहचान

मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय, बलरामपुर ने हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम में ऐतिहासिक बदलाव करते हुए एक अनूठी पहल की है। पहली बार ‘हनुमान चालीसा’ को स्नातक (बीए) पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यह रचना बलरामपुर के संत तुलसीदास की है — न कि गोस्वामी तुलसीदास की। संत तुलसीदास ने इसे इसी आध्यात्मिक भूमि पर रचा, जो आज करोड़ों भक्तों के लिए भक्ति और आस्था का प्रतीक बन चुकी है।


📖 स्थानीयता से वैश्विकता की ओर पाठ्यक्रम का नया रूप

कुलपति प्रोफेसर रविशंकर सिंह के नेतृत्व में विश्वविद्यालय ने हिंदी विभाग के पाठ्यक्रम को स्थानीय संस्कृति और भाषा से जोड़ते हुए उसे वैश्विक दृष्टि दी है।
अब विद्यार्थी केवल साहित्य नहीं पढ़ेंगे, बल्कि अपनी मिट्टी की खुशबू, लोकभाषा की आत्मा और अवधी की सुगंध को भी महसूस करेंगे।

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📚 बीए में ‘रामलला नहछू’ और ‘अयोध्या कांड’ का अध्ययन

बीए प्रथम वर्ष के छात्रों को अब

  • ‘अयोध्या कांड’ (दोहा 28 से 41)
  • ‘रामलला नहछू’
    पढ़ाया जाएगा।
    ‘रामलला नहछू’ गोस्वामी तुलसीदास की अवधी बोली में रचित वह कृति है, जिसमें बालक राम के नहाने, खेलने और बाल-लीला के भाव को अत्यंत सरल भाषा में दर्शाया गया है।
    यह पहली बार है जब किसी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में अवधी रूप को इतना सम्मानजनक स्थान दिया गया है।

🕉️ एमए में ‘सुंदरकांड’ से भक्ति और काव्य का संगम

एमए प्रथम वर्ष के हिंदी पाठ्यक्रम में अब ‘सुंदरकांड’ को जोड़ा गया है।
इससे छात्रों को तुलसीदास के काव्य कौशल, भाषा-सौंदर्य और भक्ति दर्शन की गहराई को समझने का अवसर मिलेगा।
यह अध्यात्म और साहित्य के मेल का ऐसा उदाहरण है, जो विद्यार्थियों को केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि भी प्रदान करेगा।


📜 संत तुलसीदास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

प्रो. शैलेंद्र नाथ मिश्र के अनुसार, बलरामपुर के तुलसीपुर क्षेत्र के भोजपुर निवासी संत तुलसीदास ने ही हनुमान चालीसा की रचना की थी।
बाद में वे भवनियापुर में बस गए और तुलसीपुर नगर की स्थापना की।
उन्होंने स्वयं को गोस्वामी तुलसीदास का अवतार माना।
इस तथ्य का उल्लेख 1940 के दशक में ‘कल्याण’ पत्रिका में प्रकाशित विनायक के लेख में और अखिल भारतीय विक्रम परिषद, काशी द्वारा प्रकाशित तुलसी ग्रंथावली में भी मिलता है।


💬 ‘अपनी जड़ों से जुड़े बिना ज्ञान अधूरा’ — समिति सदस्य सर्वेश सिंह

हिंदी पाठ्यक्रम समिति के सदस्य सर्वेश सिंह ने कहा —

“मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय का यह निर्णय न केवल पाठ्यक्रम को समृद्ध करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देगा कि अपनी जड़ों से जुड़कर ही ज्ञान का वृक्ष फलता-फूलता है।


🌿 सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में बलरामपुर

यह पहल न केवल बलरामपुर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देती है, बल्कि इसे ‘तुलसी परंपरा’ के केंद्र के रूप में स्थापित करती है।
अब विश्वविद्यालय केवल शिक्षा का स्थान नहीं रहेगा, बल्कि यह एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का केंद्र बनकर उभरेगा।


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