🏛️ इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त रुख : शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया पर मांगा पूरा ब्योरा


🏛️ इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त रुख : शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया पर मांगा पूरा ब्योरा

शिक्षा सेवा चयन आयोग से जवाब तलब, पूछा — “शिक्षकों की नियुक्ति का अधिकार किसके पास?” 🤔

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग से शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी पूरी कार्यप्रणाली का ब्योरा मांगा है।
यह निर्देश न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की एकल पीठ ने गिरिराज कुमारी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।


📚 खाली पड़े पदों से ठप हो रहा पठन-पाठन

याचिकाकर्ता ने बताया कि बाबा श्रीपति सरजू प्रसाद जूनियर हाईस्कूल में शिक्षकों और क्लर्क के कई पद लंबे समय से खाली हैं।
इससे विद्यालय में पठन-पाठन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
उन्होंने अदालत से मांग की कि आयोग को शीघ्र शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू करने के लिए निर्देशित किया जाए।

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⚖️ हाईकोर्ट ने आयोग से पूछा –

अदालत ने शिक्षा सेवा चयन आयोग के अध्यक्ष से यह स्पष्ट करने को कहा है कि —

  • शिक्षकों के चयन में आयोग की वास्तविक भूमिका क्या है?
  • किस कानून या प्रविधान के तहत आयोग को प्राथमिक, जूनियर हाईस्कूल, हाईस्कूल, इंटरमीडिएट और उच्च शिक्षा स्तर की नियुक्तियों का अधिकार प्राप्त है?
  • क्या बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) के पास किसी शिक्षक या कर्मचारी की नियुक्ति का वैधानिक अधिकार है?

📄 सरकारी पक्ष ने दी जानकारी

सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि

  • कक्षा-III और कक्षा-IV के पद अब “डाइंग कैडर” (मृत श्रेणी) घोषित किए जा चुके हैं।
  • शिक्षकों के रिक्त पदों के लिए पहले परीक्षा कराई जा चुकी है, और परिणाम भी घोषित हो चुका है,
    लेकिन मामला न्यायालय में लंबित होने के कारण नियुक्ति प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई है।

📅 अगली सुनवाई 28 अक्टूबर को

कोर्ट ने सरकारी पक्ष और स्थायी अधिवक्ता शैलेंद्र सिंह को निर्देश दिया है कि वे रिट की संपूर्ण सामग्री देखकर
स्पष्ट स्थिति अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें।

मामले को अब 28 अक्टूबर 2025 को ‘फ्रेश केस’ के रूप में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।


✍️ “सरकारी कलम” की राय

शिक्षा विभाग में रिक्त पदों के कारण विद्यालयों में बच्चों की पढ़ाई सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही है।
हाईकोर्ट का यह कदम यह संदेश देता है कि—

📢 “यदि स्कूलों में शिक्षक नहीं होंगे, तो नीतियाँ और योजनाएँ सिर्फ कागज़ पर ही रह जाएँगी।”

अब निगाहें आयोग और सरकार के जवाब पर टिकी हैं, जिससे यह तय होगा कि भर्ती प्रक्रिया में देरी का असली जिम्मेदार कौन है।


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