छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट: सहमति से बने संबंध—रेप नहीं, CAF जवान बरी ⚖️

बिलासपुर हाईकोर्ट ने कहा — सहमति से संबंध बने तो यह रेप नहीं ⚖️💬

| बिलासपुर, छत्तीदगढ़ 📍

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक संवेदनशील और विवादास्पद मामले में फैसला सुनाया है जिसमें CAF (छत्तीसगढ़ आर्ड फोर्स) के जवान पर दायर रेप (धारा 376) के आरोप खारिज कर दिए गए और उसे बरी कर दिया गया। जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की पीठ ने पाया कि इस मामले में पीड़िता और आरोपी के बीच संबंध सहमति से बने थे, इसलिए इसे दुष्कर्म के दायरे में नहीं रखा जा सकता। 🔍

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मामले का संक्षेप — क्या हुआ था? 🧾

यह मामला बस्तर (जगदलपुर) जिले का है। पीड़िता ने 2020 में शिकायत की कि उसकी शादी 28 जून 2020 को तय थी, परंतु 27 जून 2020 को आरोपी रूपेश कुमार पुरी (25) ने उसे अपने घर ले जाकर शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाए और बाद में दो महीने तक रखा — फिर शादी से इनकार कर घर से निकाल दिया। पुलिस ने इस पर धारा 376(2)(न) के तहत मामला दर्ज किया। फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 21 फरवरी 2022 को रूपेश को 10 साल की सजा और 10,000 रुपए जुर्माना सुनाया था। ⚖️

हाईकोर्ट ने क्या पाया?

  • बालिग और आपसी सहमति: अदालत ने पाया कि पीड़िता बालिग थी और उसने स्वयं लंबे समय तक आरोपी के साथ रहने की बात स्वीकार की।
  • प्रेम संबंध की पृष्ठभूमि: दोनों एक ही गांव के रहने वाले थे और 2013 से उनकी प्रेम-रिलेशनशिप रही — यानी मामला प्रेम संबंध का प्रतीत हुआ, न कि शादी का झांसा देकर दुष्कर्म का। ❤️
  • सबूतों की कमी: मेडिकल और FSL रिपोर्ट में दुष्कर्म के ठोस प्रमाण नहीं मिले।
  • फेसबुक और बातचीत: पीड़िता ने खुद माना कि उसने फेसबुक पर आरोपी को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी और दोनों के बीच लगातार बातचीत होती रही।
  • परिवारिक दबाव का असर: अदालत ने नोट किया कि अगर आरोपी के माता-पिता सही व्यवहार करते तो पीड़िता के माता-पिता शायद FIR दर्ज न कराते — यानी पारिवारिक मनमुटाव ने भी भूमिका निभाई।

आख़िर फैसला — बरी ✨

इन तथ्यों और गवाहियों के परीक्षण के बाद बिलासपुर हाईकोर्ट ने फास्ट-ट्रैक कोर्ट के 21 फरवरी 2022 के फैसले को रद्द कर दिया और रूपेश को बरी कर दिया। अदालत ने माना कि सहमति से बने शारीरिक संबंध को दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता। 🏛️

किस तरह के सवाल उठते हैं? ❗️

यह फैसला कई संवेदनशील पहलुओं पर प्रकाश डालता है — जैसे कि सहमति (consent) की धारणा, वयस्कता और सहमती का प्रमाण, पारिवारिक दबाव, और सोशल मीडिया पर बातचीत का महत्व। ऐसे मामलों में न केवल कानूनी साक्ष्य बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ भी निर्णायक होते हैं। इसलिए हर केस की बारीकी से तफ्तीश जरूरी है। 🔎

न्यायिक और सामाजिक निहितार्थ

– यह फैसला स्पष्ट करता है कि भारतीय न्यायव्यवस्था में सहमति एक महत्वपूर्ण तत्व है; जहां सहमति पुख्ता दिखाई देती है, वहां दुष्कर्म का मुकदमा टिक नहीं सकता।
– साथ ही, यह भी दिखाता है कि मीडिया में उभरने वाले मामलों, पारिवारिक विवादों और सामाजिक दबावों को न्यायालय अलग-अलग तौर पर तौलता है।
– ऐसी स्थिति में पीड़ितों और आरोपियों दोनों के बयान, चिकित्सीय/वैज्ञानिक रिपोर्टें और पारिवारिक संदर्भ निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ⚖️

निष्कर्ष

हाईकोर्ट का यह निर्णय संवेदनशील, जटिल और तथ्य-आधारित है — जिसने मामले के सबूतों और परिस्थितियों को प्राथमिकता दी। जहां सहमति स्पष्ट हो, वहां दुष्कर्म का दोष सिद्ध नहीं माना जा सकता; परन्तु हर केस अलग होता है और सार्वजनिक बहस में संवेदनशीलता और सहानुभूति बनाए रखना आवश्यक है। 🧭

✍️ रिपोर्ट: | अपडेटेड केस नोट

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